अनुभव दूसरों का भी होता है(काम स्वयं के भी आता है) जैसे ज़हर से दूसरों को मरते देखकर होता है ।
अनुभूति स्वयं की ही जैसे गुड़ का स्वाद ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

घंटे में मधुर ध्वनि यों ही नहीं निकल आती !
पहले धातु तेज अग्नि में तपती है, सांचे में ढ़लती है फ़िर Fine Polish की जाती है, तब मंदिर की शोभा बढ़ाती है/मधुर स्वर से भगवान की स्तुति करती है ।

मुनि श्री अविचलसागर जी

संसार तथा परमार्थ की यात्रायें, सूक्ष्म से शुरु होकर अंत भी सूक्ष्म पर ही समाप्त होती हैं ।
जन्म/मृत्यु (एक cell से राख),
सूक्ष्म निगोदिया (जीव/कीड़े) से मोक्ष (आत्मा) तक ।

चिंतन

इसका शब्दार्थ क्या है और जाप करने से कर्म कैसे कटते हैं ?

“ज” जन्म, “प” पाप;
जो जन्म और पाप यानि संसार को समाप्त करे ।
इष्ट-देव की जाप करने से विशुद्धता/ऊर्जा आती है, जो कर्मों को काटती है ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

नाली की गंदगी साफ करने, नाली/गंदगी में उतरना होता है ।
पापों की सफाई करने, पापों में (स्वीकार करना होगा कि हम पापी हैं) ।
वह भी शुरु से(जीवन के प्रारंभ से), वर्तमान की सफ़ाई से शुरूवात की तो पहले की गंदगी सड़ती रहेगी/ जीवन में बदबू आती रहेगी ।

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