विनय यानि सामने वाले के अनुकूल प्रवृत्ति करना ।
ख़ुद से पूछें…
क्या हम बड़ों/ गुरु/ शास्त्र और भगवान की विनय करते हैं ?
मुनि श्री अविचलसागर जी

(Rajat Singh Jain)
“पूज्य” बनो, या “पूजक”,
तीसरा कुछ नहीं, तीसरा तो बस “तीये” की बैठक होगी ।
मुनि श्री सुधासागर जी
ज्ञान पढ़ा/बोला जाता है, Theory है;
विज्ञान ज्ञान के साथ साथ किया/देखा जाता है, Practical भी है ।
चिंतन
जैसे सकलपारा चासनी में “पग” जाता है/चासनी उसके कण कण में समा जाती है, ऐसे ही हम अपने हठाग्रह/भौतिकता से “पग” गये हैं ।
अति के पगने पर पागल हो जाते हैं,
इसी से उन्हें पग+लिया कहना भाव-संगत लगता है ।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
संयोग बहुतेरे, संयोगी भाव न कर;
संयोगी भाव करै तो, संयोगों का दोष नहीं ।
श्री लालमणी भाई
सबसे पहला और सरल संयम है – “नज़र पर नज़र रखना”
मुनि श्री अविचलसागर जी

(अनुप्रिया – फ़रीदाबाद)
आयु कट रही है जैसे कैंची कपड़े काटती है,
कर्म बढ़ रहे हैं जैसे अलमारी में कपड़े,
क्या करें ?
कैंची तो अपना कर्तव्य करती ही रहेगी,
तुम्हारा कर्तव्य है – आयु बढ़ने के साथ साथ कपड़ों को कम करते चले जाना ।
मुनि श्री प्रमाण सागर जी
साधुजन अपनी रक्षा खुद नहीं करते ! चाहे उनके पास कितनी भी मंत्रादि शक्तियाँ हों ।
क्योंकि उसमें दुशमन की हिंसा का दोष लगेगा/ उत्तम-अहिंसा व्रत का पालन नहीं हो पायेगा ।
इनकी रक्षा का दायित्व, श्रावकों पर होता है ।
मुनि श्री सुधासागर जी
भगवान की “जय हो” के नारे क्यों लगाये जाते हैं ?
वे तो सब पर विजय प्राप्त कर चुके हैं !
“जय हो” नारा नहीं, जयघोष है…
भगवान जयवंत रहें, धर्म की प्रभावना हो/ धर्म बढ़े ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
मोह की गाँठ को ढ़ीला करने के लिये खींचना (अपनी ओर) बंद कर दो (Neglect करो संबंधों को),
ज्यादा खींचने से तो गांठ और Tight हो जाती है ।
ऊपरी बाधा प्राय: गाँवों/गरीबों में देखी जाती है, जेलों में एक भी केस नहीं सुना ।
क्योंकि इसका संबंध अंधविश्वास/ मनोविज्ञान/ अतृप्त इच्छाओं की पूर्ति के लिये देखा जाता है ।
मुनि श्री सुधासागर जी
भगवान को कभी देखा नहीं फिर भी वे दु:ख में क्यों याद आते हैं ?
जिससे जितना पुराना और नज़दीकी रिश्ता होता है, वह उतना ही ज्यादा याद आता है ।
भगवान से हमारा जन्म-जन्मांतरों का रिश्ता है/ वे हमारे रग-रग में बसे हैं/ मैं खुद भगवन-आत्मा बन सकता हूँँ ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
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