Tension is who you think you should be.
Relaxation is who you are.
जीव रक्षा क्यों, आत्मा तो कभी मरती नहीं ?
ताकि मनुष्यादि अपना आत्मकल्याण करके दु:खों से मुक्ति पा सकें ।
पर कीड़े-मकोड़े/पेड़-पौधे तो आत्मा को जानते भी नहीं, तो कल्याण कैसे करेंगे ?
असहाय की रक्षा करके, दया के भावों से अपना आत्मकल्याण कर सकते हैं न !
आचार्य श्री विद्यासागर जी
कर्म किया जाता है, धर्म धारण करते हैं,
कर्म करने से धर्म बना रहता है ।
साधु बिना कर्म किये हुये भी धर्म बनाये रखते हैं/बढ़ाते भी जाते हैं ।
गुरु/भगवान को जब नाव बना लिया फिर तनाव कैसा ?
मनुष्य यंत्रों की सहायता लेकर भी भटक जाता है ।
पक्षी हजारों किलोमीटर बिना यंत्रों के अपने गंतव्य पर पहुँच जाते हैं, क्योंकि वे लीक/परम्परा पर चलते हैं ।
रोगों के आने के रास्तों को बंद करना ही आरोग्यता है ।
रास्ते बंद करने का तरीका ?
मन,वचन,काय की पवित्रता से ।
आचार्य श्री विद्या सागर जी

(अरुणा)
धर्म-चर्चा से जरूरी नहीं कि आप आगे बढ़ेंगे,
पर इतना अवश्य है कि आप पीछे नहीं जायेंगे ।
सुखाभास (सांसारिक/इंद्रिय सुखों को सुख मानना) की तरह दुखाभास भी होता है ।
दुखाभास =
1. दुखों को ओढ़ लेना
2. इच्छित वस्तु का ना मिलना
धागे के अहम् को बनाये रखने के लिये मोम अपना सर्वस्य दे देता है, फिर भी धागे का वहम् समाप्त नहीं होता, हम इनसे दूर कैसे रहें ?
“मैं” बुरा नहीं, आवश्यक है;
“मैं कुछ हूँ” का वहम् बुरा है ।
वहम् ही अहम् को पैदा करता है ।
“अर्हम्” को पहचान लो तो वहम् भी नहीं और अहम् भी नहीं ।
पूजा/आहार में शुद्ध धोती-दुपट्टा पहनने से बाह्य शुद्धता के साथ साथ अंतरंग शुद्धता/शक्ति बढ़ जाती है ।
जैसे पुलिस वाला यदि सादा कपड़ों में हो और उससे झगड़ा किया तो कम सज़ा, पर वही यदि वर्दी में हो तो !
मुनि श्री सुधा सागर जी
मृत्यु से डर लगता है कि उस पार ना जाने कैसा/क्या होगा ?
तभी दरवाजा खुला और पालतु कुत्ता खुश होकर मालिक को चाटने लगा ।
कुत्ते को बस इतना मालूम था कि उस पार उसका मालिक है,
और क्या/कैसा है ! उसकी उसे कोई जिज्ञासा/डर नहीं ।
पारुल – दिल्ली
हमारी उम्र इतनी नहीं कि हम ख़ुद हर प्रकार की गलती कर सकें, इसलिये दूसरों की गलतियों से सीख लेना ही होगा ।
(यदि हम अपनी प्रगति तेज करना चाहते हों और गलतियों के जाल से बचना चाहते हों, तो)
मुनि श्री प्रमाणसागर जी

(Suresh)
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