अनन्त संख्या को कैसे समझें ?
अनन्त वह जिसमें आय न हो, सिर्फ़ व्यय ही व्यय हो पर संख्या अनन्त रहे,
जैसे भविष्य आज अनन्त है, अनन्त काल के बाद भी अनन्त रहेगा।
(जैसे विज्ञान में इंफिनिटी – इंफिनिटी = इंफिनिटी)।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

जब कण-कण में भगवान है तो मंदिर जाना क्यों ?
हवा तो धूप में भी पर उसका आनंद छाँव में ही क्यों / कार में हवा भरवाने पंपिंग स्टेशन पर जाते क्यों !

(श्रीमती शर्मा – पुणे)

 

  • संसारी सुख…
      • हर सुख के पीछे दु:ख जैसे भोजन बनाने में दु:ख, उसे सुख की आशा कि परिवारजन खुश होंगे।
      • दु:ख का प्रतिकार ही सुख है जैसे रोग दूर करने के लिए औषधि।
      • इच्छा की पूर्ति पूरी न होने पर दु:ख, पूरी/ अधूरी पूर्ण होने का सुख।

    छोटी-छोटी इच्छा पूर्ति होने की संभावना ज्यादा, पूरी न होने पर निराशा भी कम।

  • सच्चा/शाश्वत सुख …आत्मिक/ भगवान का।

 

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

सांकृत्यायन जी ने लिखा है…मोक्ष घुमक्कड़ों को ही होता है।
क्योंकि उनका कोई व्यक्तिगत/ स्थायी ठिकाना नहीं होता, बहुत दिन ठहरे पानी में तो कीड़े पड़ जाते हैं।

ब्र. डॉ. निलेश भैया

नॉनवेज में हिंसा का कारण बताने पर कुतर्क दिए जायेंगे। समझायें कि यह गंदा होता है क्योंकि इसमें खून, मांस, हड्डी आदि होते हैं। जबकि वनस्पति में यह सब नहीं होते हैं। इंफेक्शन होने की संभावना भी बहुत है।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

शिष्य…कौन सी आदत अच्छी, कौन सी बुरी और यह जीवन में कैसे आती हैं ?
गुरु ने कुटिया के एक तरफ औषधि के पौधे बुववाये, दूसरी ओर को खाली छोड़ दिया। कुछ दिनों बाद औषधि के पौधों को बड़ा करने में बहुत मेहनत करनी पड़ी, खाली जगह में खरपतवार अपने आप उग आई।
अच्छी आदतों/ पुण्य के लिए पुरुषार्थ करना पड़ता है। बुरी आदतें/ पाप बिना पुरुषार्थ के जैसे गुस्सा करना कोई सिखाता नहीं है।

ब्र. डॉ. निलेश भैया

क्या भगवान के ज्ञान में आधुनिक उपकरण मोबाइल आदि नहीं था?
यदि था तो उन्होंने ऐसे सुविधाजनक उपकरणों के बारे में बताया क्यों नहीं?
पिता बच्चों से उन चीज़ों को छुपा कर रखता है जिनके बुरे साइड इफेक्ट्स होते हैं, दुर्भाग्य बच्चों ने उसे ढूंढ निकाला है।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

एक गाँव में सब स्वस्थ। सम्मान करने अधिकारी आये। पर एक व्यक्ति मरियल सा दिखा।
ये कौन है ?
ये गाँव का डॉक्टर है।

आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे… “स्वोपकारी ही परोपकारी” हो सकता है।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

बड़ों के प्रति नम्रता कर्तव्य है,
तो हम-उम्र के प्रति विनय की सूचक,
अनुजों के प्रति कुलीनता की द्योतक एवं सबके प्रति सुरक्षा है।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

पाँचों पाप रोग-रूप हैं।
हिंसा, झूठ, चोरी और कुशील के तो लक्षण दिखते हैं और उनका इलाज सम्भव है, पर परिग्रह के लक्षण अंतरंग हैं। बाहर से कोई इलाज नहीं कर सकता।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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