कामना उतनी ही करो जितनी औकात हो (पुण्य हों) ।
मज़दूर ने ज़मींदार की शानदार घोड़ी देख, भगवान से ऐसी ही घोड़ी मांगी ।
तभी घोड़ी के घोड़ी पैदा हुई, जमींदार ने घोड़ी की बच्ची मज़दूर के सिर पर रखवाकर मीलों दूर अपने घर ले गया ।

प्राय: धर्मात्मा निर्धन क्यों होते हैं ?

समझदार माँयें बच्चों को उतना ही देती हैं जितने में उनका पालन हो सके, ताकि वे बिगड़ ना जायें ।
पूर्व के पापोदय से धर्मात्मा निर्धन तो हो सकता है, पर दु:खी नहीं ।

श्रावक के धन और तन रूपी दीपक में जब गुरु के मन और वचन रूपी घी और बाती आ जाती है, तब प्रकाश होता है/सामाजिक कार्यों की सिद्धी हो जाती है ।

मुनि श्री समयसागर जी

भक्ति क्यों नहीं हो पाती ?

क्योंकि हम पापों पर विश्वास करते हैं, पुण्य पर नहीं ।
श्री राम वनवास जाते समय प्रसन्न इसलिये थे कि उन्हें अपने पुण्यों पर विश्वास था ।

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April 8, 2022

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