विकारी मृत व्यक्ति को भी सब कंधे पर उठा कर क्यों ले जाते हैं?
क्योंकि मृत्यु के बाद विकार समाप्त हो जाते हैं।

(Divya)
भक्ति का मापदंड़ विरक्ति है ।
सपनों के साथ पुरुषार्थ किया जाये तभी वे लक्ष्य में परिवर्तित हो पाते हैं ।
भोजन ना आत्मा करती है, ना शरीर ।
भोजन तो शरीर और आत्मा के बीच का Agreement है, साथ रहने का ।
जो देश/ समाज/ परिवार/ शरीर की बाधाओं के रहते हुये भी धर्म करने की राह निकाल ही ले ,
कृत से ना कर सके तो कारित या अनुमोदना से करे ।
“पर” के नियंत्रण में Energy Consume होती है,
“स्वयं” के में Preserve ।
माचिस मिलना भाग्य,
उससे आग लगाना या दीप जलाना पुरुषार्थ ।

(P.L.Benara)
साधु-चर्या नित्य एक सी होते हुए भी उबाऊ नहीं,
क्योंकि अनुभूति नित्य नयी होती है ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
जिस क्रिया से सुख मिले उनसे सकारात्मकता आती है पर सिर्फ अपने को सुख देने वाली से नहीं, पर को भी सुख मिले उससे आती है ।
सच्चा शिष्य वह, जो गुरु का मुख नहीं, पीठ चाहे;
गुरु प्रतिकूल हों, पर शिष्य अनुकूल रहे/उसका अनुसरण करे, बिना गुरु की कृपादृष्टि पाये भी ।
पहले मंत्रों को सिद्ध करके काम करवाते थे,
फिर तंत्र विद्या आयी ;
ये दोनों भावनात्मक थे ।
अब यंत्र की बहुलता है जैसे क्रेन से बड़े बड़े सामान उठाना,
यह द्रव्यात्मक है ।
जो पुण्य से ऊब जाये, वह धर्मात्मा ।
मुनि श्री सुधासागर जी
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