पांड़वों की माँ वनवास में भी साथ रहीं,
कौरवों की माँ ने उनके साथ रहकर भी उन पर नज़र तक नहीं डाली ।
मीठे पानी की नदी खारे समुद्र में क्यों गिरती है ?
महत्त्वाकाँक्षा की वजह से,
ऐसे व्यक्तियों का हश्र भी ऐसा ही होता है,
अपना अस्तित्व खो देते हैं ।
सबको अपने अपने गुणों को बढ़ाना चाहिए ।
जानवर विजातियों को दूध पिलाते हैं, मनुष्य जेठानी, देवरानी के बच्चे को नहीं ।
शक्कर तो सबके कपों में होती है, कुछ उसे घोल लेते हैं (जीवन में),
कुछ ज़िंदगी भर फीकी चाय ही पीते रहते हैं, शक्कर बची रह जाती है, बरबाद हो जाती है ।
गुण/अवगुण तो सबमें होते हैं,
पर धर्म से गुणों में स्थिरता आती है जैसे दूध का दही बन जाता है।
धर्म अवगुणों से ऊपर उठा देता है जैसे मक्खन ऊपर आ जाता है ।
चिंतन
भाव सहित बिना माला (उँगलियों पर) के भी मालामाल हो सकते हैं ।
भाव रहित सोने की माला फेरने से भी सूने रह सकते हैं ।
गाय को पानी/दाना दो, तो दूध मिलता है ।
साँप को दूध पिलाओ, तो ज़हर मिलता है ।
नीचे से ऊपर (वालों साधु आदि) का अनुमान गलत ही होगा,
ऊपर से नीचे देखने पर तो चक्कर आ जाते हैं ।
सही एहसास/अनुमान समान धरातल पर आने पर ही होता है ।
आम आदमी को मांसाहार में हिंसा के बारे में कम,
शाकाहार के फायदे,
शरीर की निरोगता,
भावों पर असर/संवेदनशीलता के बारे में ज़्यादा समझाऐं ।
“समय” जब नाच नचाता है ना साहिब !
तब सारे सगे-संबंधी काेरियाेग्राफर बन जाते हैं !!
(डॉ.अमित राजा)
सुंदर मोर* कम होते जा रहे हैं,
जो हैं उनकी आवाज़ शोर शराबे में सुनाई नहीं देती है ।
उन्हें देखने/सुनने सुबह जल्दी उठकर, उनके पास जाना होता है।
चिंतन
*अच्छे इनसान/साधु जन
ग़लतफ़हमियों के सिलसिले इतने दिलचस्प हैं…..
हर ईंट सोचती है, दीवार मुझ पर टिकी है…..!!
(सुरेश)
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