सरलता याने लचीला, मृदुता, निश्छलता ।
वे अड़ते नहीं, सो लड़ते नहीं ।
मन, वचन, काय में सादगी/शुद्धता/दिखावा नहीं ।
खाने, पीने, पहनावे में सात्विकता ज़रूरी ।
विश्वास : आदर्श पर विश्वास करके अपना कल्याण कर लेने का विश्वास,
अंधविश्वास : आदर्श ही मेरा कल्याण कर देगा ।
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(Br.Sanjay)
बिना ज्ञान, परम्परागत धर्म से लाभ सूक्ष्म होता है ।
भगवान की वंदना करते हुए सब पक्षी नृत्य करने लगे, पर मोर ने अपने प्रिय पंखों का विसर्जन किया ।
पंख यानि पक्ष यानि अहंकार का विसर्जन ।
सुधारने से नहीं, (ख़ुद) सुधरने से सुधरते हैं ।
ऐसे सुधरे मुड़ जाते हैं,
फिर मुड़कर नहीं देखते हैं ।
क्षु. श्री ध्यानसागर जी
इतने धर्मानुष्ठान होने पर भी पाप बढ़ क्यों रहे हैं ?
क्योंकि धर्मानुष्ठान से ज़्यादा पापानुष्ठान हो रहे हैं, जानवरों के कत्ल की चीखों की आवाज़ों में मंत्रोचार की आवाज़ें दब जाती हैं।
आज जो कुछ धर्म बचा है, वह उन्हीं धर्मानुष्ठानों के कारण है ।
समुद्र में नहाने का सुख विषय-भोग का सुख है –
जब तक नहाये आनंद, बाद में खुजली, मीठे जल से नहाना होता है ।
समाजवाद में सुविधायें एक सी हो सकती हैं, पर स्वास्थ्य/स्वभाव कर्मानुसार ।
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(डा.अमित राजा)
द्रढ़ता, स्थिरता, निर्विकारता ही भगवत्वता प्रगट करने में निमित्त हैं ।
संसारी जीव करुणा करते हैं, निमित्त के सहारे से ।
गुरु/भगवान करुणामय रहते हैं, उनको निमित्त की ज़रूरत नहीं;
इसलिए अच्छे बुरे निमित्त का उन पर प्रभाव नहीं पड़ता ।
इहभव और परभव के कल्याण के लिये….
कर्म-फल की परवाह करना,
(जैसे ये करने का क्या फल होगा,
ये ना करने का क्या फल होगा)
कर्मसिद्धांत की परवाह करना है ।
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