गुरु/भगवान के दरबार में “द” शब्द वाली वस्तु “स” शब्द में बहुत ही जल्दी बदलती है..
जैसे दुःख बदल जाता है, सुख में;
दुविधा बदल जाती है, सुविधा में;
दुर्गुण बदल जाते हैं, सद्‍गुण में;
दुर्बलता बदल जाती है, सबलता में;
दरिद्रता बदल जाती है, संपन्नता में;
दुर्विचार बदल जाते हैं, सद्विचार में;
दुर्व्यवहार बदल जाता है, सद्व्यवहार में;
दुष्परिणाम बदल जाते हैं, सद्परिणाम में;
दुराचार बदल जाता है, सदाचार में;
दाग बदल जाते हैं, साख में;
दुर्भावना बदल जाती है, सद्भावना में ।

(धर्मेंद्र)

गाँव छोड़कर शहर आये एक व्यक्ति ने क्या खूब लिखा है …
“गाँव छोड़ के शहर आया था
फिक्र वहां भी थी, फ़िक्र यहां भी है।
वहां तो सिर्फ ‘फसलें’ ही खतरे में थीं,
यहां तो पूरी ‘नस्लें’ ही खतरे में हैं ….

(धर्मेंद्र)

तुम किस किस को हटाओगे ?
किस किस को घर से निकालोगे ?
इसलिये,
स्वयं निकल जाओ ।
स्वयं हटना बहुत सरल है,
इसीलिये, साधु संसार को नहीं हटाता, स्वयं हट जाता है ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

किसी ने पूछा, “जीवन क्या है?”
एक उत्तम उत्तर……
जब मनुष्य जन्म लेता है तो उसके पास सांसें तो होती हैं, पर कोई नाम नहीं होता ,
और जब मनुष्य की मृत्यु होती है तो उसके पास नाम होता है, पर सांसें नहीं होती।
इसी सांसों और नाम के बीच की यात्रा को “जीवन” कहते हैं।

(रजनी)

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April 8, 2022

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