Category: पहला कदम
संवत्
क्या शुरू के तीर्थंकरों के समय संवत् होते थे ? नहीं, क्योंकि उनकी आयु बहुत ज्यादा होती थी। बस तिथियाँ होती थीं। (पहले केवलज्ञानी भी
संज्ञा / क्रिया
संज्ञा तो हर संसारी जीव में पायी जाती हैं (10वें गुणस्थान तक)। पर जब वे क्रिया रूप में परिवर्तित होती हैं तब घातक हो जाती
तत्त्व चर्चा
जिनको तत्त्वों में श्रद्धा न हो, उनके साथ तत्त्व चर्चा करने से –> वचन व्यय। संताप। अपवाद (कुप्रभावना तथा धर्म की अविनय होती है)। आर्यिका
भरत / बाहुबली
बाहुबली जी के दीक्षा के समय हालाँकि भरत मौजूद थे। पर उन्हें बाहुबली जी कि एक साल के उपवास/तप के नियम के बारे में पता
निगोद जाना/आना
तीव्र मिथ्यात्व/पाप निगोद जाने के कारण हैं। निकलने के कारण –> त्रस आयुबंध + कषाय की मंदता। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (शंका समाधान – 25)
जिन दर्शन/पूजा
जिन दर्शन…. जैनों का लक्षण है। जिन पूजा…..जैनों का आवश्यक है। मुनि श्री सुप्रभसागर जी
उदीरणा
श्रमण तथा श्रावक दोनों ही उदीरणा करते हैं: श्रमण पापकर्म की तथा श्रावक पुण्यकर्म की। श्रमण जितनी ज्यादा सर्दी सहेंगे, उतनी ज़्यादा पापकर्मों की उदीरणा
प्रीति
भय दिखाकर प्रीति कैसे हो सकती है ! कुदेवों से भय तो हो सकता है (मिथ्यादृष्टियों को), पर उनसे भी प्रीति कैसे हो सकती है
कल्याण
आगम समझ आता नहीं, हमारा कल्याण कैसे होगा ? कल्याण आगम जानने से नहीं, उस पर श्रद्धा रखने से होता है। तभी तो णमोकार समझ/
अनुयोग
बनतीं हैं भूमिकाएँ प्रथमानुयोग से, आतीं हैं योग्यताएँ करणानुयोग से, तब पकतीं हैं पात्रताएँ चरणानुयोग से, फिर आत्मा झलकती द्रव्यानुयोग से। समाधि भक्ति में क्रम
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