Category: पहला कदम

छूने से अशुद्धि

मुनि को आहार को जाते समय यदि कोई भक्ति के अतिरेक/ अज्ञानतावश पैर छू ले तो अपवाद स्वरूप अशुद्धि नहीं मानना। आगम में कथानक आता

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नियतिवाद

ईश्वरवाद से भी घटिया नियतिवाद है। क्योंकि ईश्वरवाद में नियति को बदलने का अधिकार एक (ईश्वर) को तो है। ब्र. डॉ. नीलेश भैया

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सफाई

भवन में कचरे की सफाई नहीं, तो जीवन का विकास नहीं। कचरा साफ भी करते हैं तो देश-संयम की तरह कोने में जमा कर देते

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अनर्थ-दंड

व्यर्थ नहीं वह साधना, जिसमें नहीं अनर्थ*। भले मोक्ष हो देर से, दूर रहे अद्य-गर्त।। आचार्य श्री विद्यासागर जी (सर्वोदय शतक) *अनर्थ-दंड।

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पुरुष की स्पर्श क्षमता

पुरुष मनुष्य-लोक के हर भाग को स्पर्श कर सकता है। ऋद्धिधारी मुनियों से मनुष्य-लोक का कोई भाग अछूता नहीं रह जाता, स्त्री नहीं कर सकतीं

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मानुषोत्तर पर्वत

मानुषोत्तर पर्वत पुष्कर-द्वीप के ठीक मध्य में नहीं है। बल्कि मनुष्य-लोक का आधा भाग निकल जाने/ पूरा हो जाने के बाद में है (मनुष्य की

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Self-dependent / Independent

Self-dependent/Independent तो दो ही हैं… एक सिद्ध भगवान और दूसरा आकाश द्रव्य। मुनि श्री सौम्य सागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र-अध्याय 3 – अगस्त 30)

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आस्रव / संवर

आचार्य श्री विद्यासागर जी का एक चिंतन… जैसे आस्रव का निरोध संवर है वैसे ही यह भी कहा जा सकता है कि संवर का निरोध

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मार्दव धर्म

आचार्य श्री विद्यासागर जी कहा करते थे… मार्दव धर्म मेज के कोने जैसा है, जिनको गोल कर दिया गया हो। इससे खुद भी सुरक्षित और

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कर्म / दुःख

कर्म दुःख दे सकता है पर दुखी नहीं कर सकता वरना कर्म तो 10वें गुणस्थान के ऊपर भी हैं। मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन

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मंगल आशीष

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