Category: वचनामृत – अन्य
मरघट
ऐसा कोई घर है जिसमें मरण ना हुआ हो ? हम जिसे मरघट कहते हैं वह तो “चलघट” है, मरघट तो हमारे घर हैं ।
यंत्र
यंत्र को भगवान से टिकाकर नहीं रखना चाहिये । मुनि श्री प्रमाणसागर जी
भ्रम
स्पर्श, रस, गंध और वर्ण पुदगल में हैं और आत्मा उसे आत्मसात कर अपने में मान रही है ! (खुद को शरीर मान बैठी है)
कालद्रव्य
कालद्रव्य सूक्ष्म भी है (निश्चय से), बादर भी है (व्यवहार से) । मुनि श्री विनिश्चयसागर जी
एकलव्य / अर्जुन
इनमें से कौन बड़ा ? जिन्हें गुरु प्राप्त नहीं होते, उनमें एकलव्य बड़ा, जिन्हें गुरु प्राप्त होते हैं, उनमें अर्जुन बड़ा । मुनि श्री सुधासागर
अमूढ़-दृष्टि / स्थिति-करण
रेवती रानी ने समवसरण को नहीं स्वीकारा, राजा श्रेणिक ने गलत आचरण वाले मुनि को नमोस्तु किया, सही कौन ? दोनों सही, रेवती रानी ने
भगवान के जन्म
भगवान पापियों का नाश करने नहीं, पुण्यात्माओं का उद्धार करने जन्मते हैं, जैसे जमीन में पानी ढ़ूंढ़ने के लिये नारियल का प्रयोग किया जाता है
पूजा में स्थापना
बैठकर पूजा करने वालों को ठौने में स्थापना बैठकर ही करना चाहिये, वरना स्थापित द्रव्य नाभि से नीचे हो जायेगा । मुनि श्री सुधासागर जी
पुण्य
पुण्य की ज़रूरत तब तक, जब तक हमसे पाप हो रहा है । कीचड़ पाप है, इसे साफ करने पुण्य रूपी जल चाहिये, बिना पानी
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