Category: वचनामृत – अन्य
अभाव
अभाव दु:खदायी नहीं, अभाव की अनुभूति दु:ख देती है । सबसे ज्यादा अभाव में तो साधू रहते हैं, पर ना उनका अभाव उन्हें दु:खी करता
परोपकार
शुद्ध वह जिसका मन शुद्ध हो, और मन शुद्ध होता है परोपकार से । (परोपकार अपना भी । सिर्फ अपनों का नहीं, वह तो हिंसक
पुण्योदय / पापोदय
पुण्योदय में संकट नहीं आते, पापोदय में यदि धर्म करें तो संकट टलेगा तो नहीं क्योंकि धर्म अन्याय नहीं होने देगा । पर भविष्य में
आशीर्वाद
“आ” से आनंद, “श” से शिव/मुक्ति । “व” से विशुद्ध, “द” से दया ।। आशीर्वाद से नकारात्मता कम होती है, सकारात्मकता और आत्मविश्वास बढ़ता है
भावना
एक राज्य में राजा अल्पायु ही होते थे । राजा के पूछने पर गुरु ने कहा कि जब वो हरा पेड़ सूख जायेगा तब बताऊंगा ।
आरती
बड़ों की आशिका अपनी ओर लें, ताकि उनके गुण/ज्योति हममें भी आयें, छोटों (दुल्हे आदि) की अपनी ओर से उनकी ओर करते हैं, ताकि हमारी
समाज सेवा
समाजसेवा क्यों करें ? समाज की वज़ह से ही हम असमाजिक तत्व बनने से बचे हुये हैं, इसीलिये समाज की सेवा करें । मुनि श्री
साधना
संसार में मन की बात ज़ुबान पर ना आने देना, ज़ुबान की बात/शरीर पर ना आने देना, तथा धर्म में मन से वचन, वचन से
धर्मात्मा
रावण 8 घंटे पूजादि करता था, पर बाकि 16 घंटे भगवान के बताये मार्ग से विपरीत आचरण करता था, इसलिये दुर्गति पायी । मुनि श्री
लापरवाही
दुर्घटनायें मोड़ों पर कम, सीधी सड़कों पर अधिक होती हैं । काँटे वहाँ ज्यादा लगते हैं जहाँ फूल बिछे होते हैं । दु:ख सुखों के
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