Category: वचनामृत – अन्य
गुरु और साधुता
सच्चा गुरु मिल जाये तो साधुता निभाना आसान हो जाता है । पर सच्चे गुरु की थाह लेना वैसा ही है जैसे कोई रस्सी में
ज्ञान
छोटा सा जुगनू पूरे आकाश के अंधकार पर भारी पड़ जाता है । हमारे हृदय का अज्ञान भी ज्ञान के दीपक से समाप्त हो सकता
संस्कार
बच्चों को याद करायें – 1. पाप से भय 2. संवेदनशीलता 3. धर्म कुल का गौरव मुनि श्री प्रमाणसागर जी
बड़ा पाप/पुण्य
पाप से भी बड़ा पाप है – “पाप को स्वीकार ना करना” । स्वीकार करते ही वह प्रायश्चित बन जाता है, तप कहलाता है ।
देवालय
जिस देह में समृद्ध आत्मा हो, उस देह को देवालय कहा है, दिवालिया देह को नहीं । आत्मा का दर्शन करना है तो दर्पण पर
सम्बोधन
राम को ईशांतराज (भील) “तू” से संबोधन कर रहे थे । लक्ष्मण को अच्छा नहीं लगा । राम ने कहा – इन्होंने अपनी (भक्त) और
काला धन
धन ना काला होता है ना ही सफेद ! धनवान और उसका मन काला/सफेद होता है । और काले को सफेद करने का उपाय वही
पूर्ण उपासना
सुबह सबके कल्याण की प्रार्थना करें मंदिर में भगवान के गुणों का गुणगान रात्रि में आत्मचिंतन आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी
सुखकारी / हितकारी
सुख तात्कालिक होता है । हित कागज़ों में लगे पिन जैसा होता है जो जोड़कर तो रखता है पर चुभता भी है । क्यों ना
ज्ञान और धर्म
ज्ञान पूर्ण नहीं तो धर्म को भी अपूर्ण मानें ? ज्ञान अभिव्यक्ति है इसलिये अपूर्ण, धर्म अनुभूति है इसलिये पूर्ण । मुनि श्री प्रमाणसागर जी
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