Category: वचनामृत – अन्य

जानना / मानना

जानने के साथ मानने वाले युधिष्ठिर, और सिर्फ़ जानने वाले दुर्योधन बनते हैं । मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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सदुपयोग / दुरुपयोग

सदुपयोग – समय पर किया गया कार्य, दुरुपयोग – समय निकलने के बाद किया गया कार्य । मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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साधु

साधु ब्राम्हण होता है – ज्ञान की अपेक्षा, साधु वैश्य होता है – हमेशा फ़ायदे का काम करता है , साधु क्षत्रिय होता है –

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जन्म / मरण

जनसाधारण जन्म से खुश, मरण से डरता है; साधुजन मृत्यु का महोत्सव मनाते हैं, जन्म से डरते हैं (गर्भ की पीड़ा/बार-बार जन्म से) । मुनि

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धर्म

धर्म क्या है ? अधर्म का अभाव ही धर्म है । (और अधर्म को तो हम सब खूब समझते ही हैं) मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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गुरुदर्शन

चोर साधुओं के पास इसलिये नहीं जाते, क्योंकि उनके पास वह सब नहीं है जो उन्हें चाहिये । यदि हम भी उनके पास नहीं जा

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भूत / भविष्य / वर्तमान

भूत को Dustbin मानो, भविष्य को Notice Board, और वर्तमान को Writing Pad(for Notice Board) (पर WritingPad Dustbin से मत लेना-पुश्किन) मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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शुद्धता / उपयोगता

बर्तन बाहर से मांजने पर शुद्ध दिखता है, पर उपयोगता अंदर की शुद्धता से ही होती है । मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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मोरपंख

मोर मांसाहारी पर पंख साधुओं की पीछी में क्यों ? गाय अशुद्ध खाती है, पर दूध शुद्ध । उसका ही मल अशुद्ध और मांस अभक्ष्य

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मंगल आशीष

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