Category: अगला-कदम
उपभोग
मुनियों का उपभोग – प्रवचन, आहार क्रिया, पर रागद्वेष रहित, इसलिए बंध नहीं। श्रावकों का रागद्वेष सहित सो बंध का कारण। श्रावक कम से कम
पंचम काल में भाव
पंचम काल में औदयिक भाव (गति, कषाय, शरीर नाम कर्म आदि) सबसे ज्यादा होते हैं। दूसरे स्थान पर क्षयोपशमिक भाव(ज्ञान, दर्शन)। पारिणामिक तो हमेशा बना
द्रव्य-इंद्रिय
स्पर्शन → अनेक प्रकार वाली (1 इंद्रिय से 5 तक)। रसना → खुरपा की Shape, जिव्हा बाह्य उपकरण। घ्राण → अतिमुक्ता पुष्प (तिल का फूल)।
मतिज्ञान
पर्याय प्रति समय परिवर्तित होती रहती है। जब एक ही वस्तु को दुबारा देखते हैं तो वस्तु बदल चुकी होती है। सो ज्ञान हर बार
आयुबंध
कषाय के उदय स्थानों में 8 मध्यम अंश हैं जो आयुबंध के योग्य हैं। हर लेश्या में – शिला, पृथ्वी, धूलि, जल जैसी तीव्रता, तो
मूर्ति
पाषाण की मूर्ति वास्तव में दिगम्बरत्व का असली प्रतीक है, इसमें अवांछनीय पदार्थ (छाँट-छाँटकर) निकाल दिया जाता है। जबकि धातु की मूर्ति में संग्रह होता
द्रव्य लेश्या
वर्ण-नामकर्म के उदय से शरीर का वर्ण होता है। इसे लेश्या इसलिए कहा क्योंकि यह शरीर का रंग बनाती है और रंग से गोरे/ काले
अरहंत के मन
संसारी के वचन, मन पूर्वक ही। ऐसा मन सयोगी के नहीं, इसलिये मन उपचार से कहा क्योंकि वचन की प्रवृत्ति तो हो रही है। उपचार
स्व/स्वरूप संवेदन
स्व संवेदन… मैं हूँ/ आत्म संवेदन। स्वरूप संवेदन जैसे गर्म पानी जो उसका स्वभाव नहीं है (पर वर्तमान में उसका स्वरूप गर्म है) मुनि श्री
षटस्थान हानि
कृष्ण आदि लेश्या में षटस्थान हानि – 1. अनंतभाग हानि 2. असंख्यात भाग हानि 3. संख्यात भाग हानि और और बडी हानि – 4. संख्यात
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