Category: डायरी
परमात्मा
कारण परमात्मा…. बीज/ संसार/ बिंदु। इसलिये संसार भी आदरणीय, यहाँ तक पेड़ादि भी क्योंकि वे मनुष्य की वंशवृद्धि में सहायक हैं। इसके लिये उदार चित्त
संकल्प
बोतलें भर भर कर रक्तदान करते हैं, उसमें तकलीफ महसूस नहीं करते लेकिन मच्छर अगर एक बूँद खून ले जाए तो बिलबिला जाते हैं। कारण
रोग और निदान
रोग पैदा तो होता है मन में, पनपता है शरीर में। जिस क्षेत्र में रोग होता है, निदान भी उसी क्षेत्र में पाया जाता है।
कुज्ञान
प्यासे को मिर्च खिला दो तो पानी तो आएगा पर कंठ में नहीं, आँखों में दिखेगा। लेकिन प्यास बुझाएगा नहीं। यह तो मृगमरीचिका से भी
प्रमाद / लोभ
मनुष्य पर्याय बहुत पुरुषार्थ से मिली है।यदि हमने प्रमाद( गर्मियों में तो बिस्तर भी कहता है कि जल्दी उठ, पसीने से बिस्तर तर हो रहा
ज्ञान
ज्ञान की प्रमाणिकता जानने का साधन ? चारित्र। तभी तो कहा है → बिना अभ्यास ज्ञान विष समान। चारित्र ज्ञान की भाषा है। कुलीनता/ अकुलीनता,
मंदिर निर्माण
क्या वास्तु दोष भगवान के मंदिरों पर भी प्रभाव डालते हैं ? वास्तु का अर्थ है भवन और मंदिर भी एक भवन ही है। ग्वालियर
प्रतिक्रमण
प्रतिक्रमण में श्रमण अपने को जड़ बुद्धि, पापी आदि से संबोधित करता है पर श्रावक उन्हें ज्ञानी और पुण्यात्मा आदि कहते हैं। यही तो अनेकांत
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