Category: वचनामृत – अन्य

मोह

एक शराबी बीच सड़क में पड़ा था । सब उसे बचने के लिये समझा रहे थे । वह सुन सबकी रहा था पर देख नहीं

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दु:ख

अधूरे तो हम सब हैं, पर ज्ञानी इस अधूरेपन को दूर करने में लगातार प्रयत्नशील रहता है । अज्ञानी प्रयत्न नहीं करता, बस दु:खी रहता

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मंदिर

मंदिर की क्या जरूरत है, भगवान तो हमारे दिल में है ? आपके प्रियजन भी तो आपके दिल में हैं, फिर उनसे मिलने क्यों जाते

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मैं

मैं शरीर नहीं हूँ, मैं शरीर में हूँ । मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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मंदिर दर्शन

यदि मंदिर सिर्फ मंदिर जाने के लिये जा रहे हो तो याद रखना उस मंदिर के चूहे आदि बनोगे । यदि अपने अंदर जाने के

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दृष्टि

जड़* पर दृष्टि रहे तो, जड़ मज़बूत, गहरी होगी । जड़* का स्वभाव समझ आयेगा । * Root मुनि श्री विनिश्चयसागर जी

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जीवन

सारंगी जीवन है, सारंगी के ज्ञान रूपी तारों को , साधना रूपी ऊँगुलियों से बजाया तो मधुर संगीत निकलेगा, वरना ये सारंगी कवाड़ा हो जायेगी ।

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धर्म

पहाड़ों पर पानी दिखता नहीं है, पर सब मीठे पानी की नदियाँ वहीं से निकलती हैं । समुद्र में पानी ही पानी है पर प्यास

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विश्वास/श्रद्धा

विश्वास संसारी जीवों पर होता है, श्रद्धा सच्चे देव, शास्त्र, गुरु पर होती है । मुनि श्री विनम्रसागर जी

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मंगल आशीष

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