Category: वचनामृत – अन्य
कर्तृत्व/कर्तव्य
June 5, 2013
कर्तृत्व में कर्ता का भाव है, अहम् है, कर्तव्य में बिना पाने की इच्छा के सेवा भाव है । मुनि श्री प्रमाणसागर जी
गुरू
May 30, 2013
शिष्य को गुरू कुछ देते नहीं हैं, सिर्फ पहचानने की कला बता देते हैं । मुनि श्री प्रमाणसागर जी
Nimitta
May 26, 2013
My pain be the reason for somebody’s laugh. But my laugh must never be the reason for somebody’s pain. – Aacharya Vishudh Sagar Ji
धर्म
May 9, 2013
धर्म स्वर्ग पाने के लिये नहीं जीवन को स्वर्ग बनाने के लिये होता है । मुनि श्री प्रमाणसागर जी
तप
April 18, 2013
घी और रूई मंगल नहीं हैं, पर जब दीपक में जलने लगती हैं, तो मंगल बन जाती हैं । तप का यही महत्व है । मुनि
दु:ख
March 23, 2013
दु:ख आयें तो पाप क्रियाओं को दूर करें, क्योंकि दु:ख आते ही पूर्व के पापकर्मों से हैं । मुनि श्री प्रमाणसागर जी
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