Category: वचनामृत – अन्य
शव यात्रा
शव यात्रा चाहते हो या शिव यात्रा ? आचार्य श्री विशुद्धसागर जी
दु:ख/सुख
दु:ख छोड़ना आसान है, सुख छोड़ना कठिन । ठंड़ से घबराकर कमरे में आना आसान, ठंड़ में कमरे से बाहर जाना कठिन । आचार्य श्री
भ्रम
भ्रम के चार प्रसंग – 1. अहंकार 2. ममकार 3. करतत्व 4. भोगत्व आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी
शब्द
शब्द पर अटकने के बजाय, उसके आशय पर जाओ । शब्द में इतनी सामर्थ कहाँ कि शब्द के आशय का पूर्ण बखान कर सके ।
निर्मलता
बच्चों पर कामदेव भी असर नहीं करता । बच्चों जैसे निर्मल बन जायें तो विकार नहीं आयेंगे । आर्यिका सोहार्दमति जी
बटवारा
दो भाईयों में बटवारा एक कीमती शीशे को लेकर अटक गया, कौन ले ! गुरू के पास गये,उन्होंने शीशे को पटक दिया, दरार पड़ गयी
योगी/भोगी
समय के साथ – योगी का चेहरा सौम्य और सुंदर होता जाता है, भोगी का चेहरा विकृत और असुंदर होता जाता है । उपाध्याय श्री
मोह/रागद्वेष
मोह जननी है, रागद्वेष संतति । चिंतन मोह ही संसार का बीज भी है । क्षु. श्री गणेशप्रसाद वर्णी जी
मन
मन की दलीलों को दरकिनार नहीं किया तो दलदल में धंसते चले जाओगे/दलित बन जाओगे । आर्यिका श्री सोहार्दमति माताजी
तप
तप करता शरीर है, पर बिना मन के नहीं होता और मन की शुद्धि के लिये ही किया जाता है । मुनि श्री प्रमाणसागर जी
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