Category: वचनामृत – अन्य
आत्मबल
आजकल आत्मा दुर्बल होती जा रही है, क्योंकि उसका भोजन उसे नहीं मिल रहा है । क्षु. श्री गणेश वर्णी जी
पुरूषार्थ/कर्मोदय
पुरूषार्थ = Doing/ करना । कर्मोदय = Being/ हो जाना । आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी
समता
मुर्दा ड़ूबता नहीं, ड़ूबता तो ज़िंदा ही है । क्योंकि मुर्दा के समता भाव है और ज़िंदा छटपटाता है, अहंकारी है और कर्ता की भावना
दुःख
एक आदमी बस में गंदी सीट पर बैठा और पीठ में दर्द कर लिया । घर आने पर उसको पूछा – आपने अपनी सीट किसी
ज्ञान
हम सब अपने ज्ञान का अनादर करते हैं। जैसे हम सब जानते हैं कि झूठ बोलना पाप है, फिर भी बोलते हैं। मुनि श्री योगसागर
आपदा
मेरी द्रष्टि में आपदायें हैं, प्राकृतिक परीक्षायें! उनसे वही ड़रें जिनकी कच्ची हो शिक्षायें/आस्थायें ! मुनि श्री योगसागर जी
साधुता
कभी घी घना, कभी मुट्ठी भर चना और कभी वह भी मना । मुनि श्री योगसागर जी
भाग्य/पुरूषार्थ
जो सहजता से मिले, वह भाग्य। जो मेहनत से मिले, वह पुरूषार्थ।। आर्यिका श्री प्रज्ञामति माताजी
साधु
कम खाना, कम सोचना, कम दुनिया से प्रीति। कम कहना मुख से वचन, यही साधू की रीति।। मुनि श्री योगसागर जी
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