Category: वचनामृत – अन्य
मंदिर में शिक्षा
स्कूल में पढ़ाई, बाहर/आगे जाकर कमाई करने के लिये होती है । मंदिर में शिक्षा भी मंदिर के बाहर उपयोग के लिये । मुनि श्री
शिक्षक / गुरू
शिक्षक वह सिखाता है, जो वह जानता है, गुरु वह उपदेश देता है, जो वह होता है । मुनि श्री सुधासागर जी
जीने का उद्देश्य
इस और अगले जन्म को सार्थक बनाना ही जीने का उद्देश्य होना चाहिये । आ. श्री महाप्रज्ञ जी इस जीवन को विषय-भोगों से वंचित रख
संस्कृति
क्रिया और विचारों का संस्कार ही संस्कृति है । मुनि श्री प्रमाणसागर जी
मान
मान तभी आता है, जब हम मान लेते हैं (कि हम बड़े हैं) । निर्यापक मुनि श्री वीरसागर जी
अधूरे
हम अधूरे क्यों ? हम दृश्य को ही जानते/जानना चाहते हैं । जबकि अदृश्य, दृश्य से अनंतगुणा है । मुनि श्री महासागर जी
रिश्ते
क्या रिश्ते स्वार्थ पर आधारित होते हैं ? रिश्ते स्वार्थ से नहीं बनते, स्वार्थ से तो टूटते हैं । जो स्वार्थ पर आधारित होते हैं,
धर्म / शर्म
धर्म में शर्म कैसी ? जब पापी दुनिया की शर्म ना करके, पाप नहीं छोड़ते तो धर्मात्मा धर्म क्यों छोड़ें ! मुनि श्री सुधासागर जी
ग्रह और कर्म
ग्रह अच्छा बुरा समय लाते नहीं, बल्कि उनकी ओर इशारा करते हैं । अच्छा बुरा समय तो कर्मों से ही आता है । मुनि श्री
ज्ञान
आकुलता का कारण – जब दूसरों को जानने की कोशिश हो, निराकुलता का कारण – जब अपने को जानने की कोशिश हो । मुनि श्री
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