Category: वचनामृत – अन्य

संस्कृति

विकृति को परिष्कृत करना संस्कृति है, जैसे पत्थर से विकृति निकालने से वह भगवान बन जाता है । मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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धर्म

जो धर्म को धारण करता है, वह उदाहरण बन जाता है । मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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आस्था / भावना

आस्था अच्छी ही होती है, भावना अच्छी/बुरी दोनों । आस्था में भावना होती है, भावना में आस्था ज़रूरी नहीं । आस्था भावना का परिष्कृत रूप

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सच्ची आत्मीयता

सच्चे भक्त को गुरु/भगवान से कुछ नहीं चाहिये, उसे तो गुरु/भगवान चाहिये । सच्चे इंसान/मित्र की भी अपने प्रियजनों के प्रति ऐसी ही भावना होती

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बात मानना/करना

जब सब अपनी अपनी ही मानते और करते रहते हैं फिर भी खुश क्यों नहीं रहते ? इसीलिये क्योंकि वे अपने मन की ही करना चाहते

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भाव प्रधानता

भाव प्रधानता का मतलब यह नहीं कि भावों से कार्य की पूर्णता कर लें, क्रिया की जरूरत ही नहीं, बल्कि यह कि… हर क्रिया भावपूर्ण

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स्वाभिमान / अभिमान

स्वाभिमान से विनम्रता बढ़ती है, अभिमान में घटती है । स्वाभिमान में दोनों हाथ पीछे से आगे लाना है (पीछे वालों को साथ लेकर चलना),

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पुरुषार्थ

गड्डे में गिरे व्यक्तियों में से पहले किसको निकाला जाता है ? जो खड़ा होता है, फिर जो बैठा होता है, अंत में जो लेटा

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मंगल आशीष

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