Category: वचनामृत – अन्य
कर्तापन
यदि भगवान कर्ता होता, (हमारे आज के कर्मों/कर्म फलों का) तो यह संसार बंद ही हो गया होता । मुनि श्री समय सागर जी
आचार / विचार
आचार – धर्म है, विचार – अध्यात्म है । क्षु. श्री ध्यानसागर जी
नज़रिया
नज़ारे नज़र नहीं दिखाती बल्कि नज़रिया दिखाता है । नज़रिया को ही सच्चा/झूठा दर्शन कहा है । क्षु. ध्यान सागर जी
सुख / दु:ख
पराश्रित सुख से उत्तम स्वाश्रित दुःख है, तभी तो साधु विषय-सुखों का त्याग करके तप के दुःख को अंगीकार करके सुखी रहते हैं। क्षु.श्री ध्यान
पैसे का घमंड
अपनी उम्र और पैसे पर, कभी भी घमंड़ मत करना। क्योंकि जो चीजें गिनी जा सकें, वो यकीनन खत्म हो जाती हैं ! क्षु.श्री ध्यान
परिस्थितिवश पाप
परिस्थिति पाप नहीं कराती, पाप तो मन:स्थिति से होता है। जिस परिस्थिति में रागी, पाप करता है; उसी परिस्थिति में वैरागी पुण्य करता है ।
बंधन
सांसारिक बंधन पुराने जूते जैसा होता है – पता ही नहीं लगता कि पैर जूते में फंसा है । पता तब लगता है जब जूता
मुहूर्त
मुहूर्त तो शादी (फंसने) के लिये देखा जाता है, तलाक (निकलने) के लिये नहीं । मुनि श्री कुंथुसागर जी
सक्रियता
जुगनू की चमक, उसके सक्रिय होने पर ही दिखती है । मुनि श्री प्रमाणसागर जी
संसार के दु:ख
पं श्री जगमोहनलाल जी ने आचार्य श्री विद्यासागर जी से पूछा – आपको वैराग्य कैसे हुआ ? आचार्य श्री – आप लोगों के चेहरों को
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