Category: वचनामृत – अन्य

अनुकम्पा

अन्य के दु:खों को देखकर कंपन होना । मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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मन

मन रूपी खेत में यदि अच्छे विचारों की फसल नहीं बोयी तो घास तो उगेगी ही । मुनि श्री वीर सागर जी

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गुरू

जहाँ नदी का पानी (भगवान की वाणी) नहीं पहुँच पाता, वहाँ गुरू रूपी नहर/पाइप से पानी पहुँचाया जाता है । मुनि श्री निर्वेगसागर जी

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दु:ख

अभाव दु:ख का कारण नहीं, अभाव की अनुभूति/एहसास कारण है । मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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संतोष

संतोष में पीड़ा की समाप्ति, असंतोष में पीड़ा की निरंतरता रहती है । मुनि श्री कुंथुसागर जी

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प्रसन्नता

प्रेशर कुकर की तरह, क्रोध का प्रेशर आये तो प्रसन्नता की सीटी बजाओ । मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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इच्छा

इच्छाओं को इच्छाशक्ति में परिवर्तित करना होगा । निर्यापक मुनि श्री वीरसागर जी

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संवेदना

संवेदनशील ही सत्संग में जाकर सद्भावनाओं को परिष्कृत करता है । उससे आत्मशुद्धि कर, सिद्धि को प्राप्त करता है । मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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निर्वाण

निर्वाह = जीवन यापन निर्माण = जीवन मूल्यों की स्थापना निर्वाण = जीवन मूल्यों की स्थापना का फल मुनि श्री प्रमाण सागर जी

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दान

कौन से दान को प्राथमिकता देनी चाहिए ? जिसका अवसर पहले आ जाय । मुनि श्री प्रमाण सागर जी

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मंगल आशीष

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