क्या 2 रोटी खाने वाले से 10 रोटी खाने वाले का पुण्य ज्यादा होता है ?
नहीं, यदि 2 रोटी खाने वाला, 10 रोटी वाले से ज्यादा तृप्ति अनुभव कर रहा है तो उसके पुण्य ज्यादा है ।

(धर्मेन्द्र)
बचपन कैसे संजोकर रखें ?
सहज, सरल और निर्मल बन कर ।
कैसे बनें ?
सहज – स्वीकृति से,
अकृतिमताओं को कम करके – सरल,
धर्म/गुरु की शरण से निर्मल ।
3 प्रकार का – तामसिक – हर समय चिड़-चिड़ करते रहना,
राजसिक – अपना रौब बनाये रखने के लिये ,
सात्विक – सामने वाले की भलाई के लिये ,
इसमें प्रवृति बदल जाती है, समझाना भी आ जाता है ।
धर्मध्यान अग्रिम ज़मानत है,
इसीलिये घर से बाहर जाने से पहले देवदर्शन करके जाते हैं,
पापोदय होने पर विधानादि करते हैं ।
चिंतन
किसी व्यवसाय में खर्चा/परेशानी ज्यादा, कमाई /सुकून कम हो तो उसको बुरा कहोगे ना ?
संसार में भी सुख (सुखाभास) कम, दु:ख ज्यादा, इसलिये बुरा कहा ।
सबसे सरल तप – प्रसन्न रहना,
इससे पुण्यबंध होता है,
पापोदय शांत होता है,
तथा
कर्म झरते भी हैं ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
जो ज्येष्ठ बनने में लग जाते हैं, वे श्रेष्ठ नहीं बन पाते हैं ।
जो श्रेष्ठ बनने के प्रयास में लग जाते हैं, वे ज्येष्ठ भी बन जाते हैं ।
मुनि श्री विनिश्चयसागर जी

(सुरेश)
संसार में सबसे ज्यादा प्रेम स्वयं से होता है,
इसके कारण ही व्यक्ति संसार की ओर भागता है,
तथा
संसार से दूर भी भागता है,
यहाँ तक की कुछ लोग आत्महत्या भी कर लेते हैं ।
जैसे भगवान, वैसा मैं – अभिमान आयेगा, प्रगति का भाव नहीं होगा ।
जैसी चींटी, वैसा मैं – हीनता का भाव आयेगा ।
“जैसा मैं, वैसा मैं”…क्यों ना कहें !
भगवान बनने के काम करें, चींटी बनने वाले कामों से बचें ।
चिंतन
स्वाभिमान में अपना तथा दूसरे का मान,
अभिमान में अपना मान तथा दूसरे का अपमान ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
परीक्षा तो दोनों की होती है,
साधु परीक्षा के लिये सदैव तैयार/इच्छुक रहता है,
श्रावक घबराता है, पर पास होने पर नाचता है, फेल होने पर रोता है ।
Real freedom starts in the mind,
not merely by cutting ropes.
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