आँख वस्तु को बिना छुए ज्ञान प्राप्त करती है। ज्ञानी भी जानता/ देखता है, चीज़ों में involve नहीं होता।
वृद्धावस्था में इंदियाँ जबाब दे देती हैं। बस आँख की तरह दूर से समझो/ अंदर में रहो। सुखी रहोगे, क्योंकि सुख तो अंदर ही है।

आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी

स्त्री…
संयम + त्रि (धर्म, अर्थ, काम)

आचार्य श्री विद्यासागर जी

नारी तो नारायण की जननी है।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

हराने से बेहतर है, जीत लिया जाय।
राम रावण को हरा नहीं सकते थे, बुराई में, सो जीत गये अच्छाई में।
कई बार हार कर भी जीता जा सकता है (इसीलिये राम ने रावण को संदेश भेजा कि सीता को लौटा दो, मैं बिना बदला लिये वापस चला जाऊँगा)

मुनि श्री मंगलानन्द सागर जी

वृद्धावस्था के लाभ…
सर्दी लगी/ छींक आयी, डबल कपड़े पहन लिये (युवाओं की तरह लापरवाही नहीं) समस्या समाप्त।
गलती हुई, प्रायश्चित/ क्षमा माँगली, स्थिति सामान्य।

चिंतन

3 प्रकार के सिद्धांत –

  1. काल करे सो आज कर, आज करे सो अब…..
  2. आज करे सो कल कर, कल करे सो परसों…..
  3. आज का काम आज करो, कल का कल करना।
    पर करो आकुलता रहित/पूरी तन्मयता से।
    ये धर्म का सिद्धांत है।

चिंतन

आज सब अपनों में संलग्न, अपनों को प्रसन्न करने में लगे रहते हैं।
अपने को/ अपने लिए कुछ नहीं।
माँ बच्चों की प्रसन्नता में ही प्रसन्न। पति पत्नी को, पत्नी पति के लिए जीवन अर्पण। जबकि कोई भी “पर” को प्रसन्न कर ही नहीं सकता। यदि पति पत्नी खुद को प्रसन्न कर ले तो दोनों प्रसन्न हो सकते हैं।

ब्र. (डॉ.) नीलेश भैया

आत्मा गुब्बारे जैसी है… जन्म के समय बिंदु के आकार की। कर्मों के अनुसार आकार बढ़ता तथा Shape लेता जाता है। जैसे गुब्बारे में हवा भरती जाती है, किसी की Shape आदमी की किसी की जानवर की।

चिंतन

भावना… मन में उस भाव को बार-बार लाना ताकि मन उस भाव के लिए तैयार/ संस्कारित हो जाए। जैसे 16 प्रहरी पीपल बहुत असरदार होती है। पांच-पांच भावनाएँ महाव्रतियों के लिए पर देशव्रती भी भायेंगे।
भावना मन से भाई जाती है, व्रत/ संकल्प बुद्धि से लिए जाते हैं। व्रत प्रारंभिक साधना है। मन तथा बुद्धि को एक करना ही साधना है।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – 7/3)

दुखियों के प्रति कारुण्य भाव रखना/ हृदय द्रवित होना अच्छा है, पर दु:खी नहीं होना (दूसरों के दु:ख को अपने ऊपर ओढ़ना नहीं)।
कारण/ फायदा ?
सुख के समय फूलेंगे नहीं/ मन Balance रहेगा।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – 7/11)

अमेरिका के बड़े धनी एंड्रयू कार्नेगी ने सफलता का रहस्य वबताया…
सोने की खदानों में टनों मिट्टी हटाने/Ignore करने पर एक/दो ग्राम सोना नज़र आता है।
इससे आदत पड़ जाती है, अवगुणों को ignore करके गुणों को ग्रहण करने की।

ब्र. (डॉ.) निलेश भैया

जैसे-जैसे पैसा बढ़ता जाता है, शून्यता भी बढ़ती जाती है(1, 10, 100…..)।
इसीलिए बुजुर्गों ने 11-101 आदि की भेंट शुरू करीं ताकि एकता(1) बढ़े।

गौरव – चिंतन

इसलिए ही कहा जाता है… मुर्गी जैसे जैसे मोटी होती जाती है, उसके अंडे वैसे वैसे छोटे होते जाते हैं! यानी जमा में शून्य बढ़ते जाते हैं।………….. जे.पी.शर्मा


“छाता” बारिश तो नहीं रोक सकता,
पर “बारिश” में खड़े होने का “साहस” ज़रूर देता है।
ठीक उसी तरह “आत्मविश्वास,”सफलता” की गारंटी तो नहीं देता,
लेकिन “संघर्ष” करने की “प्रेरणा” अवश्य देता है।

(राजीव जैन – नया बाजार मंदिर-ग्वालियर)

सबसे करीब हमारी आत्मा, लेकिन करीब रहते हैं दूसरों की आत्मा के।
“स्व” के ऊपर श्रद्धालु ही “पर” श्रद्धालु हो सकता है।
जो ख़ुद सुखी नहीं वह दूसरों को सुखी कैसे रख सकता है!!

ब्र. (डॉ.) नीलेश भैया

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