इतने सहज भी न हो जाना की जानवरों की तरह बिना शर्म के कहीं भी/ कभी भी/ कुछ भी करने लग जाओ।
बच्चों की तरह इतने सरल भी न बन जाना की कोई भी बुद्धू बना जाए।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

सेवा में थे तब पूरी पगार, सेवा-निवृत्त होने पर आधी।
आज (81 साल के होने पर) पूछते हैं… कैसे हो ?
सेहत/ हालात पेंशन वाले* हैं, पर काम/ खर्चा सेवा के समय जैसा चल रहा है।

चिंतन

* 50% वाले।

आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे… “मोक्षमार्ग बाहर है ही नहीं।”
जैसे हवाई जहाज उठने के बाद बाहर दौड़ने में सहायक, पहियों को भी अंदर ले लेता है तभी ऊपर उठता जाता है/ गति आती है।

निर्यापक मुनि श्री संभवसागर जी

दान पर-वस्तु का जैसे धन आदि।
त्याग स्व-वस्तु का जैसे क्रोध आदि (कषाय)।

क्रोध तभी आता है जब मान को धक्का लगता है।
जैसे एक ने कहा… यह काम कर देना, काम न होने पर क्रोध आएगा।
दूसरे ने कहा… सुविधाजनक हो तो यह काम कर देना, काम न होने पर क्रोध नहीं आएगा।

मुनि श्री शैलसागर जी

विहार चल रहा था। मुनि श्री संभवसागर जी 5:50 पर निकले। आचार्य श्री विद्यासागर जी 6:00 बजे।
बहुत देर तक आचार्य श्री पीछे-पीछे चलते रहे।
मिलने पर कहा… “बहुत देर से मैं तुम्हारे शरीर का X-Ray कर रहा था”
बहुत दिनों का साइटिका का दर्द ठीक हो गया। 12 साल से फिर कभी नहीं हुआ।

निर्यापक मुनि श्री संभवसागर जी

आँख वस्तु को बिना छुए ज्ञान प्राप्त करती है। ज्ञानी भी जानता/ देखता है, चीज़ों में involve नहीं होता।
वृद्धावस्था में इन्द्रियाँ जवाब दे देती हैं। बस आँख की तरह दूर से समझो/ अंदर में रहो। सुखी रहोगे, क्योंकि सुख तो अंदर ही है।

आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी

स्त्री…
संयम + त्रि (धर्म, अर्थ, काम)।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

नारी तो नारायण की जननी है।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

हराने से बेहतर है, जीत लिया जाए।
राम रावण को हरा नहीं सकते थे, बुराई में, सो जीत गए अच्छाई में।
कई बार हार कर भी जीता जा सकता है। (इसीलिए राम ने रावण को संदेश भेजा कि सीता को लौटा दो, मैं बिना बदला लिए वापस चला जाऊँगा।)

मुनि श्री मंगलानन्द सागर जी

वृद्धावस्था के लाभ…
सर्दी लगी/ छींक आयी, डबल कपड़े पहन लिए (युवाओं की तरह लापरवाही नहीं) समस्या समाप्त।
गलती हुई, प्रायश्चित/ क्षमा माँगली, स्थिति सामान्य।

चिंतन

3 प्रकार के सिद्धांत –

  1. काल करे सो आज कर, आज करे सो अब…..
  2. आज करे सो कल कर, कल करे सो परसों…..
  3. आज का काम आज करो, कल का कल करना।
    पर करो आकुलता रहित/पूरी तन्मयता से।
    ये धर्म का सिद्धांत है।

चिंतन

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