Category: डायरी
ज्ञान / विवेक / श्रद्धा
ज्ञान से हित अहित की जानकारी होती है, विवेक से हित अहित में फर्क कर पाते हैं, श्रद्धा विवेक पैदा करती है । (गिरराज भाई)
सुख
सृष्टि* कितनी भी परिवर्तित हो जाए फिर भी हम पूर्ण सुखी नहीं हो सकते, परंतु दृष्टि थोड़ी सी भी परिवर्तित हो जाए तो हम पूर्ण
ज़िन्दगी
अच्छे ने अच्छा और बुरे ने बुरा जाना मुझे, क्योंकि जिसकी जितनी ज़रूरत थी, उसने उतना ही पहचाना मुझे; बैठ जाता हूँ मिट्टी पे अकसर,
आत्मा / परमात्मा
आत्मा भी अंदर है, परमात्मा भी अंदर है । तो आत्मा के परमात्मा से मिलने का रास्ता भी तो अंदर ही होगा न ! अतः
Fair and Open
People really like to be measured when measurement is fair and Open.
दस्तूर
आज “ज़िस्म” में जान है तो देखते नहीं हैं लोग, जब “रूह” निकल जाएगी तो कफ़न हटा हटा कर देखेंगे । ???????? सुरेश ????????
औक़ात
इंसान के ग़ुरूर की औक़ात बस इतनी सी है… ना पहली बार ख़ुद नहा सकता है, ना आख़िरी बार । (श्रीमति शर्मा)
कर्म-सिध्दान्त
अगर इंसान छाँव देने वाले वृक्षों की कद्र ना करे, तो धूप उसका नसीब बन जाती है । (मंजू …????????)
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