Category: डायरी

आकुलता

आकुलता व्याकुलता कर्मोदय से नहीं, पुरूषार्थ की कमी से होती है ।

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जीना

जो जीने देता है, वही सच्चे मायने में जी पाता है ।

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मोह

ध्रतराष्ट्र को दिखता नहीं था, पर जब भी सिंहासन की ओर मुँह करते थे उस पर दुर्योधन ही बैठा दिखता था ।

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बुराई

कचड़े में इत्र और राख में घी ड़ालने से फायदा नहीं, पहले सफाई करो ।

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काम / नाम / दाम

जब तक इनके चक्कर में रहेंगे, शुद्ध नहीं हो सकते हैं । क्षु.श्री ध्यानसागर जी

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मंगल आशीष

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