Category: डायरी

भाव / क्रिया

क्रिया साँचा है, भाव मूर्ति, विडंबना यह है कि हम साँचे को ही मूर्ति मानना शुरू कर देते हैं । (विपुल-फरीदाबाद)

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इबादत

कितने मसरूफ़ हैं हम ज़िंदगी की कशमकश में ! “इबादत” भी जल्दी में करते हैं, फिर से गुनाह करने के लिए। (धर्मेंद्र)

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मुनीम / मुनि

मुनीम भूत का हिसाब रखता है, भूत पर ही दृष्टि रहती है; मुनि की भविष्य पर । मुनि श्री सुधासागर जी

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दया के पात्र

जो स्वयं पर दया नहीं करते, वे स्वयं दया के पात्र बन जाते हैं । और जो दूसरों पर दया नहीं करते, वे दूसरों की

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पुरुषार्थ

ख़राब खेत में, ख़राब बीज बोने पर भी, पुरुषार्थ से अच्छी फ़सल काट सकते हैं ।

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रावण

1) रावण बनना भी कहाँ आसान ! रावण में अहंकार था तो पश्चाताप भी था, रावण में वासना थी तो संयम भी था, रावण में

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दु:ख / कष्ट

दुःख जिसे मन स्वीकार ना करे, कष्ट जिसे मन स्वीकार कर ले ।

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बुराई

बुराई छोड़ी नहीं जाती, उनके प्रति तो जगा जाता है । छोड़ी तो बुरी प्रवृतियाँ जाती हैं ।

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आजादी

व्यवस्थागत आजादी तो मिल गयी है पर अवस्थागत नहीं (संस्कारों से आजाद नहीं) ।

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मंगल आशीष

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