Category: डायरी
वहम
अहम् ने एक वहम पाल रखा है, सारा कारवां… मैंने ही सँभाल रखा है ! (धर्मेंद्र)
सुमिरन
मुँह में मिश्री डालकर… चाहे घूमें, चाहे बैठ जायें, चाहे लेट जायें । पर जब तक मुँह में मिश्री है तब तक मुँह मीठा रहेगा
विकल्प
युवावस्था के विकल्प वृद्धावस्था/मरणावस्था के समय बहुत प्रबल बनकर उभरने लगते हैं, क्योंकि उस समय और कुछ करने को रहता ही नहीं है ।
शब्द
“शब्द” मुफ़्त में मिलते हैं । लेकिन उनके चयन पर “निर्भर” करता है, कि उनकी क़ीमत “मिलेगी” या “चुकानी” पड़ेगी .. (अंजू जैन)
ख़्वाहिश
ख़्वाहिशें मनुष्य को जीने नहीं देतीं और मनुष्य ख़्वाहिशों को मरने नहीं देता । (श्रीमती शर्मा)
माँ-बाप
माँ-बाप के साथ हमारा सलूक… एक ऐसी कहानी है, जिसे लिखते तो हम हैं लेकिन हमारी संतान हमें पढ़कर सुनाती है । (धर्मेंद्र)
अंत का इशारा
ख़तरे के निशान के बहुत क़रीब बह रहा है उम्र का पानी ; और, वक़्त की बरसात है कि थमने का नाम ही नहीं ले
अनाथ
कुछ नादान बच्चे सब्ज़ी बेच रहे थे ! किसी ने पूछा :- “पालक” है क्या ? बच्चों का जवाब सुनकर मन भर आया, बोले… “पालक”
अतिथि
भ्रमर जैसा होना चाहिए । जोंक जैसा नहीं, ऐसी प्रवृत्ति तो त्याज्य है ।
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