Category: डायरी

मंदिर

जब कण कण में भगवान हैं तो तुम मंदिर क्यों जाते हो ? हवा तो धूप में भी चलती है पर आनंद छाँव में बैठ

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शिकायत

शिकायतें तो बहुत हैं तुझसे ऐ ज़िंदगी, पर चुप इसलिये हूँ कि, जो दिया तूने वो भी कहाँ पूरा जीया हमने … (विजय-आगरा)

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रिश्ते

नहीं छोड़ी कमी, किसी भी रिश्ते को निभाने में मैंने । आने वालों को दिल का रास्ता दिया, और जाने वालों को रब का वास्ता

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Positivity

Thanks to… nights that turned into mornings, friends that turned into family, dreams that turned into realities. (Aruna)

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आहार,भय और मौत

एक ड़ाल पर दो उल्लू, एक के मुँह में साँप, दूसरे के में चूहा; साँप के मुँह में पानी(1), चूहे का मुँह भयभीत(2) । (1)

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ज़रूरत और ख्वाहिश

नंगे पाँव चलते “इन्सान” को लगता है कि “चप्पल होती तो कितना अच्छा होता” फिर ऐसा लगा कि……… “कार होती तो धूप नहीं लगती” फिर

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सत्य

नल बंद करने से नल बंद होता है, पानी नहीं! घड़ी बंद करने से घड़ी बंद होती है,समय नहीं! दीपक बुझाने से दीपक बुझता है,

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मंगल आशीष

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