Category: पहला कदम
नियतिवाद
नियतिवाद को जैन दर्शन नहीं स्वीकारता। पूरा पुरुषार्थ करने के बाद जो भी फल आया, उसे नियति मान कर स्वीकारता है। क्षपक श्रेणी में सब
मन
“सुख-दु:ख के लिए कर्म कारण हैं” – यह तो प्रारम्भिक कथन है। असली कारण तो कर्मों से प्रभावित मन है, वर्तमान तथा भविष्य दोनों के
अनित्य भावना
सुखों को अनित्य मानोगे तो पाने की आकुलता नहीं होगी, खोने पर दु:ख नहीं, तब जीवन में सकारात्मकता आयेगी। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
ध्यान
ध्यान कल्पना ही तो है – सिद्ध, अरहंत, आत्मादि की; कैसा स्वरूप होगा आदि ! ऐसा ध्यान करते-करते एक दिन तद्-रूप भी होने की संभावना
अनर्थदंड
रावण 16 हजार रानियों को भोगता था, पर पापी नहीं; सीता पर बुरी दृष्टी डाली तो पापी – अनर्थदंड। जो भोजन मिलना नहीं, उसका मन
गोत्र / कुल
मुनिराज उच्च-कुलीन से आहार लेते हैं, उच्च-गोत्र से लेने का नियम नहीं, वरना देवता तो उच्च-गोत्री ही होते हैं; पर उनसे आहार नहीं लिया जाता।
भोग
इन्द्रिय भोग निम्ब (नीम) के पुष्प के समान—गंध अच्छी, स्वाद कड़वा। पाप के भोग में संताप तात्कालिक, पुण्य के भोग में दीर्घकालीन का बीजारोपण; आकुलता
पहली आरती….
“पहली आरति श्री जिनराजा…” , पर बड़े तो सिद्ध भगवान होते हैं ? संसार अवस्था में प्रत्यक्ष रूप से सबसे बड़े/ सबको कल्याण का मार्ग
अपशगुन
अपशगुन से डरना क्यों ? जब चार मंगल….अरहंत, सिद्ध, साधु और धर्म पर तुम्हें विश्वास है, तो अमंगल कैसे होगा ? चारों श्रेष्ठ हैं, इसलिये
विनय
सन् 89 में एक दूसरे संघ के मुनि हमारे संघ में रहे थे। वे छोटे/बड़े सब मुनियों के रोज़ पैर छूते थे। कारण ? मुनि
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