Category: वचनामृत – अन्य

मंदिर में रोना

आज संकट(कौरोना)के समय में मंदिरों के दरवाजे क्यों बंद हैं ? क्योंकि मंदिरों में रोने वाले उन्हें अपवित्र कर रहे थे। ऐसे ही सूतक के

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कार्य / अकार्य

क्या करना ! रामायण से सीखें : भ्रातृ प्रेम; क्या नहीं करना ! महाभारत से सीखें : भ्रातृ द्वेष । मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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वैराग्य

दु:ख से ऊबकर लिया गया वैराग्य टिकता नहीं। (क्योंकि पुण्य आकर्षित करता रहता है-गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी) टिकाऊ वैराग्य लेना है/प्रगति करनी है तो

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पुरुषार्थ

पुरुषार्थ रूपी हनुमान ही, शांति रूपा सीता को आत्मा राम से मिला सकते हैं। मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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भाव-भंगिमा

भाव शब्दों के, भंगिमा शरीर की; दोनों एकरूप भी हो सकते हैं, भिन्न-भिन्न भी। मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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वैराग्य

वैराग्य में घर छोड़ा नहीं जाता। घर छूटता भी नहीं; अपने घर में आया जाता है। मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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सृष्टि / पुरुषार्थ

सृष्टि अधूरा देती है; पुरुषार्थ से हमको पूर्ण करने को कहती है, जैसे… बीज दिया, फ़सल किसान उगाये; मिट्टी दी, घड़ा कुम्हार बनाये; इन्द्रियां दीं,

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वैभव

वैभव हमेशा परिग्रह ही नहीं, अनुग्रह* भी है। *Grace मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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मर्यादा

मनुष्य जागते में भी गिर जाते हैं; पक्षी सोते में भी नहीं। कारण ? पक्षी अपनी मर्यादा कभी नहीं छोड़ते; जबकि मनुष्य मर्यादा तोड़ने में

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अनेकांत

सब सही कहना सही नहीं। समग्रता से, दूसरे के दृष्टिकोण से देखना अनेकांत है। गांधी जी ने कहा था, “मैं अपने दुश्मनों को भी अपना

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मंगल आशीष

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