Category: वचनामृत – अन्य
सलाह
कील वहीं ठोको, जहाँ अंदर चली जाए। पत्थर पर ठोकोगे, तो वापस आकर तुम्हें ही घायल करेगी। मुनि श्री अविचलसागर जी
सत्य
पूर्ण सत्य तो भगवान ही जानते/कह सकते हैं । संसारी/संसार चलाने के लिये असत्य पर भी विश्वास करता है जैसे ज़हर से बनी दवा बीमारी
अपने को ढ़ूंढ़ना
परायों में अपनों को ढ़ूंढ़ना कठिन काम, अपनों में* अपने को ढ़ूंढ़ना और कठिन, अपने में अपने-आपको ढ़ूंढ़ना सबसे कठिन, पर सबसे उपयोगी भी ।
वेद और वेदना
वेद बिना संवेदना के साथ पढ़ने से सिर्फ अपनी वेदना समझ आयेगी । जिसके अंदर संवेदना है उसे वेद का ज्ञान तो हो ही जायेगा
व्यवधान
दीपक को जलना है, हवा को चलना है, दीपक बुझता है । दोष हवा का नहींं, दोनों का अपना अपना स्वभाव है । दीपक क्या
करुणा
करुणा के भेद … 1. “करने वाली” – दूसरों के निमित्त से/दूसरों के लिये । पर निमित्त कितनी देर को मिलेंगे ? सो करुणा भाव
धर्मात्माओं की रक्षा
साधुजन अपनी रक्षा खुद नहीं करते, चाहे उनके पास कितनी भी मंत्रादि शक्त्तियाँ हों क्योंकि उसमें दुश्मन की हिंसा होगी । उनकी रक्षा का दायित्व
खंडित मूर्ति
मंदिर परिसर में खंडित मूर्तियाँ नहीं रखनी चाहिये । उन्हें संग्रहालयों में भेज देना चाहिये । मुनि श्री सुधासागर जी
बोल
मनचाहा बोलने के लिये, अनचाहा सुनने की क्षमता भी होनी चाहिये । मुनि श्री प्रमाणसागर जी (यश के प्रश्न के जवाब में)
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