Category: पहला कदम

पूजा

पूजा के अंत में “इत्याशीर्वाद” बहुत महत्त्वपूर्ण है। पूजा का फल –> प्रभु का आशीर्वाद (प्रभु के गुण पाने हेतु)। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी</span

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प्रमाद

8 प्रकार की शुद्धि(काय, भाव, भाषा, विनय, ईर्यापथ, भैक्ष, शयनासन, प्रतिष्ठापन) की कमी से प्रमाद आता है। प्रमाद से बचने के लिए 5 समिति, 3

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अतिशय

अतिशय भक्तों की भक्ति से होते हैं, भगवान/ गुरु नहीं करते। भगवान के 34 अतिशय भक्तों के काम के नहीं। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

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बुद्धि / अबुद्धि

पुरुषार्थ, विकास, विनाश बुद्धि पूर्वक तो होते ही हैं, अबुद्धि पूर्वक भी होते हैं। जैसे भरत चक्रवर्ती के 923 पुत्रों ने निगोद से मोक्ष तक

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अविरति

1. अविरति के दो प्रकार का असंयम… i. प्राणी असंयम → षटकाय जीवों की रक्षा के भाव न होना। ii. इंद्रिय असंयम → मन +

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आदान-निक्षेपण

आदान-निक्षेपण = ग्रहण-छोड़ना। आदान-निक्षेपण समिति से पाप क्रियाओं से पापास्रव की जगह पुण्यास्रव हो जाता है। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र)

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स्वभाव

कहा है –> गुरु-उपदेश से वैराग्य होने पर रस बेरस लगने लगते हैं। तो क्या मिष्टान्न का मीठापन समाप्त हो जाता है? लालमणी भैया नहीं,

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पूजन / विहार

50 लोग पूजन कर रहे हों या 50 मुनि विहार में चल रहे हों, प्रभावना किसमें ज़्यादा ? विहार में। कारण ? जैविक परमेष्ठी का

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कर्म-फलादि

आदिनाथ भगवान के महीनों के अंतराय (आहार में) को कर्म-फल मानें या कुछ और ? संयोग भी हो सकता है। पार्श्वनाथ भगवान के पिछले 10

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द्रव्य का महत्व

समवसरण में पहले गुणस्थान वाले मुनि भी 13वें गुणस्थान वाले केवलियों के साथ एक कोठे में ही बैठते हैं। जबकि चौथे, पाँचवें गुणस्थान वाले श्रावक

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मंगल आशीष

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