Category: पहला कदम
दान
“अनुग्रहार्थ स्वस्ताति सर्गो दानम्” अनुग्रह में दोनों पक्षों के गुणों में बढ़ोतरी। “स्वस्ताति” → स्व-धन के अतिसर्ग (त्याग) को दान कहते हैं। यहाँ धन या
यंत्र / मंत्र / तंत्र
यंत्र —> पौद्गलिक का सहारा जैसे स्पीकर। मंत्र —> अदृश्य शक्ति का सहारा लेकर कार्य करना। तंत्र —> भावात्मक शक्ति का सहारा लेकर कार्य करना।
उपयोग
क्षयोपशम का सम्यक् उपयोग सम्यग्दर्शन/ज्ञान को क्षायिक सम्यग्दर्शन/ज्ञान तक ले जाता है। मुनि श्री मंगलसागर जी मिथ्या उपयोग (जैसे हर समय TV आदि देखना) एकेंद्रिय
अरहंत / सिद्ध
अरहंत –> ईश/ ऐश्वर्यवान/ मोक्षमार्ग के नेता। सामान्य केवली तथा सिद्धों के प्रतिहार्य नहीं होते। उन्हें ईश्वर भी नहीं कहते। निर्यापक मुनि श्री वीरसागर जी
पाठ्यक्रम
आचार्य श्री विद्यासागर जी ने तत्त्वार्थ सूत्र, समयसार आदि के बाद मूलाचार पढ़ाया। आ.श्री की चर्या ही मूलाचार थी (पहले प्रैक्टिकल दिखाए ताकि समझ में
केवली के निर्जरा
ऐसा लगता है कि 13वें गुणस्थान में आखिरी अंतर्मुहूर्त को छोड़कर सविपाक निर्जरा ही होती है। चिंतन
मन
द्रव्य-मन… पौद्गलिक, भाव-मन… आत्मा की परिणति। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
“पर”
“पर” को अपना मानने की आदत नहीं छूट रही तो “पर” के घर आदि को अपना मान कर देख लो। क्षु. सहजानंद जी
विद्याधरों को विद्या
विद्याधरों को 5 विद्याएँ कुल-परम्परा से मिलती हैं। आगे सिद्ध करके/ छीनकर ली जाती हैं। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (जीवकांड गाथा – 360 )
भगवान का श्वेत रक्त
प्रथमानुयोग के अनुसार भगवान का श्वेत रक्त होता है (5 कल्याणक वालों का)। लेकिन सिद्धान्त ग्रंथों में ऐसा वर्णन नहीं आता है। निर्यापक मुनि श्री
Recent Comments