Category: पहला कदम
श्रुतकेवली
द्रव्य श्रुतकेवली… पढ़ना/ पढ़ाना, साधक (कम से कम 5 समिति + 3 गुप्ति धारी ) भाव श्रुतकेवली… ध्यान/ उपादेय/ साध्य/ शब्दातीत/ ज्ञानात्मक परिणति/ आत्मा का
व्यवस्था
पौधों का संस्थान हुण्डक होते हुए भी, Symmetry भी दिखाई देती है। हम समचतुरस्क संस्थान वाले होते हुए भी कोई अनुशासन नहीं ! चिंतन
श्रुतज्ञानी / प्रमाण
श्रुतज्ञानी के वचन को प्रमाण किस अपेक्षा से कहा ? श्रुतज्ञानी इतने संस्कारित हो जाते हैं कि उनके वचन प्रमाण बन जाते हैं। मुनि श्री
निस्सारता
बारह भावनाओं में अनित्य भावना से लेकर आस्रव तक सात भावनाएँ संसार की निस्सारता को दर्शाती हैं। दायरा भी क्रमश: कम-कम होता जाता है संसार
अनेकांत / प्रमाण
अनेकांत और प्रमाण में अंतर क्या है ? योगेंद्र अनेकांत धर्म है, प्रमाण जानने का साधन है। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
वचन / प्रवचन
वचन… दो इंद्रियों से लेकर पंचेेंद्रिय में। इनमें सत्य, असत्य, उभय तथा अनुभय कुछ भी हो सकता है। प्रवचन…पंचेेंद्रियों (मनुष्य, मुनि, केवलियों) के द्वारा ही।
ज्ञान / आचरण
8 वर्ष के बालकों (चक्रवर्ती भरत के पुत्र) का मन समवसरण में नहीं लग रहा। घर लौटना भी नहीं चाह रहा जैसे चक्रवर्ती लौट जाता
निश्चय
व्यवहार की अधिकता -> संसार अधिक। काम की पूर्णता/ गति, व्यवहार + निश्चय से ही। व्यवहार परतंत्र, निश्चय स्वतंत्र। निश्चय होने के बाद व्यवहार से
कर्म-बंध
बंध के कारण –> भाव-कर्म। बंध का कार्य —> द्रव्य-कर्म। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र 8/01, 8/02) (भावकर्म कारण और द्रव्यकर्म कार्य. भावकर्म रूप
डायरी
डायरी के तीन पन्ने महत्वपूर्ण…आज (वर्तमान), पिछला (निकट) भूत, अगला (निकट) भविष्य। बहुत पीछे से बस सीख लें। बहुत आगे की चिंता ना करें वरना
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