Category: वचनामृत – अन्य

सीता

सीता जी पर अत्याचार नहीं, बल्कि ऊँचे स्थान पर बैठाने की प्रक्रिया थी जैसे साधुओं की कठिन साधना। तभी तो आम आदमी सीता राम कहता

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प्रतिक्रिया

2 मुर्गे लड़ते हैं प्रतिक्रिया के कारण। यदि प्रतिक्रिया न करें तो सामने वाले की स्थिति उस मुर्गे जैसी हो जाएगी जो दर्पण में चोंच

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धर्म ध्यान

गुरुजन कहते हैं → धर्म ध्यान हर समय करते रहना चाहिए। पर हर समय पूजादि तो सम्भव नहीं ! पूजादि तो धर्म के बाह्य रूप

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दुःख

हम दुःख नहीं चाहते पर दुःख के साधनों को छोड़ना तो दूर, बढ़ाते/ जमा करते रहते हैं। मुनि श्री शैलसागर जी

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वरदान

भगवान से कभी यह वर मत माँगना कि मैं अपने बच्चों की हर इच्छा पूरी कर सकूँ। ऐसा वर माँगा, तो धृतराष्ट्र बन जाओगे। निर्यापक

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इष्ट / अनिष्ट

इष्ट/अनिष्ट स्थायी नहीं रहते। माँ बचपन में इष्ट, शादी के बाद पत्नी फिर बच्चे, वृद्धावस्था में भगवान। मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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आशीर्वाद

गुरु का पहला आशीर्वाद बीज-रूप होता है। आगे के जल-रूप, पौधे को स्वस्थ बनाए रखने के लिए। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

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पुण्य / पाप

प्राय: पुण्य के उदय में पाप करने का मन होता है और पाप के उदय में पुण्य का। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

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राग / मोह

राग –> हिलमिल कर रहना। मोह –> उनके बिना न रह पाना। मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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धर्म / धर्मात्मा

धर्म से ज्यादा (जल्दी) कल्याण धर्मात्मा से। नमोस्तु धर्म को, आशीर्वाद धर्मात्मा से। पूजा धर्म की, फल धर्मात्मा बनने पर। 3 अनुयोगों (75% धर्मशास्त्र) में

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मंगल आशीष

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