Category: वचनामृत – अन्य

मंगलकारी

सुंदरता के साथ जब चारित्रिक-गुण मिल जाते हैं तब वह मंगलरूप-चेहरा हो जाता है और उनके दर्शन मंगलकारी बन जाते हैं जैसे आचार्य श्री विद्यासागर

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भगवान / भक्त

कलयुग (पंचमकाल) में भगवान तो नहीं बन सकते, उसके लिये तो बहुत परिश्रम/ त्याग करना होता है; पर भक्त बनना आसान है, बस समर्पण करना

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मोह

चिड़िया भी मनुष्यों की तरह बच्चों का लालन पालन/सुरक्षा देती है पर उन्हें उड़ना सिखाती/उड़ जाने देती है । मनुष्य अपने बच्चों को पकड़े ही

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दिगम्बरत्व

दिगम्बर वेश को देखकर, ज्यादातर को वैराग्य के भाव आते हैं, कुछ को विकार के । तो कपड़ा कुछ विकारी आंखों पर डालना तर्क संगत

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धर्म-ध्यान

धर्म में ध्यान आवश्यक नहीं, सहायक है । ध्यान तो जानवर भी कर लेते हैं । धर्म तो आत्मज्ञान से होता है/आवश्यक है । मुनि

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परख

एक व्यक्ति का चयन होना था । उसे भोज पर बुलाया गया, सूप आया, मालिक नमक डाल कर पीने लगा, उसने भी नमक मिलाकर पी

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अंतिम परिणति

सम्बंध शुरु होते हैं उत्साह के साथ पर समय के साथ नीरस होते जाते हैं । पढ़ाई में भी यही स्थिति, अन्य कामों में भी

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मन / चित्त

मन बाहरी, इसीलिये बाहरी वस्तुओं से प्रभावित हो जाता है। चित्त अंतरंग, संस्कार चित्त पर ही होते हैं, यह Hard Disk है, भाव चित्त से

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भाव शुद्धि

1. समभाव – सब जीवों पर । 2. ममभाव – कम करें । 3. प्राणायाम – शरीर शुद्धि से भाव शुद्धि भी । मुनि श्री

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निषेध

मन निषेध के प्रति आकर्षित होता है, यदि निषेध दूसरे के द्वारा आरोपित किया जाये तो। खुद के द्वारा निषेध लगाने पर मन उधर नहीं

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मंगल आशीष

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