Category: वचनामृत – अन्य
परिग्रह
जलाशय के किनारे बड़े पेड़ भी सूखने लगते हैं । (परिग्रही आसपास वालों को भी पनपने नहीं देते) आचार्य श्री विद्यासागर जी
आत्म-निरीक्षण
सामान्यत: घर में कचरा दिखायी नहीं देता है पर झाड़ू लगाने पर दिखने लगता है । ऐसे ही, आत्मनिरीक्षण करने पर दोष दिखने लगते हैं
पाप / बुरी वस्तु
पाप जिसे पापी चाहता हो, बुरी वस्तु जिसे बुरा आदमी चाहता हो । साधु ऐसी वस्तुयें रखते ही नहीं जिस पर असंयमी की नियत बिगड़े
श्रमण / श्रावक
श्रमण भोगों को निष्परिग्रह-भाव से ग्रहण करते हैं, श्रावक परिग्रह-भाव से, श्रमण को बढ़िया आहार भी रसना इंद्रिय को नियंत्रण करने का अभ्यास कराता है,
अंध-विश्वास
अंध-विश्वास से शुरुवात घातक होती है। विश्वास करने से पहले विचार/ ज्ञान/ विवेक लगायें। अंत में तो विश्वास को अंधा होना ही पड़ता है यानि
आनंद / मज़ा
संसारियों को आनंद नहीं, मज़ा (मिर्च मसाले वाला) चाहिये। मज़ा में कर्म बंधते हैं, आनंद में कटते/ घटते हैं। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
सम्बंध
सम्बंध शौक नहीं, मजबूरी है, संसारी जीवों के लिये । जब मजबूरी है तो झुककर निभाओ भी । सम्बंध जब टूटते हैं तो बैर बन
ठगी
संसार में ठगा, धर्म में आता है, धर्म में ठगा कहाँ जायेगा ? लौकिक में ठगा धनादि खोता है पर अलौकिक जन्मजन्मान्तर खो देता है
वैराग्य
वैराग्य भाव आये पर संसारियों के साथ रहने की मजबूरी हो तो संसारियों को पता मत लगने देना वरना वे रहना दुश्वार कर देंगे ।
प्रतिकार
प्रतिकार करना है तो सुख का करो, वरना सुविधाओं के आश्रित हो जाओगे । जिन्होंने किया, वे महान/ साधु/ भगवान बन गये जैसे राम/महावीर भगवान
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