Category: वचनामृत – अन्य

व्यक्तित्व निर्माण

घंटे में मधुर ध्वनि यों ही नहीं निकल आती ! पहले धातु तेज अग्नि में तपती है, सांचे में ढ़लती है फ़िर Fine Polish की

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शिक्षा और नौकरी

जब तक शिक्षा का उद्देश्य नौकरी रहेगा तब तक समाज में नौकर ही पैदा होंगे, मालिक नहीं । मुनि श्री उत्तमसागर जी

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प्रण

प्रण कब तक निभायें ? प्रण निभाने में व्यक्तिगत लाभ होता है, लेकिन वह प्रण जब समाज/देश/धर्म के लिये अहितकारी हो जाय तो तोड़ लेना

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विनय

विनय यानि सामने वाले के अनुकूल प्रवृत्ति करना । ख़ुद से पूछें… क्या हम बड़ों/ गुरु/ शास्त्र और भगवान की विनय करते हैं ? मुनि

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पूज्य / पूजक

“पूज्य” बनो, या “पूजक”, तीसरा कुछ नहीं, तीसरा तो बस “तीये” की बैठक होगी । मुनि श्री सुधासागर जी

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संयम

सबसे पहला और सरल संयम है – “नज़र पर नज़र रखना” मुनि श्री अविचलसागर जी

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सेवा / पूजा

दीन/हीन की सेवा के बदले में कुछ पाने की भावना नहीं  रहती है, पर पूजादि के बदले में कुछ पाने की भावना प्राय: रहती है

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शिक्षा

सांसारिकता में गुणा-भाग, पारिमार्थिकता में गुणात्मक प्रगति, सांसारिकता में त्रिकोण/षटकोण, पारिमार्थिकता में दृष्टिकोण विषय रहता है । मुनि श्री प्रमाण सागर जी

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शब्द

शब्द पंगु हैं, पंगु कैसे ? पिता शब्द कहते ही, उस व्यक्ति के अन्य रिश्ते गौण हो जाते हैं न ! मुनि श्री सुधासागर जी

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खंडित मूर्ति

मंदिर परिसर में खंडित मूर्तियाँ नहीं रखनी चाहिये । उन्हें संग्रहलयों में रख देना चाहिये । मुनि श्री सुधासागर जी

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मंगल आशीष

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