लाड़ से खुशी सुरक्षित, डाँट से हित।

इसीलिए गुरु शिष्य को डाँट लगाकर रखते हैं।
आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे…. पर डाँट इतनी तगड़ी मत लगा देना कि शीशी से दवा निकले ही नहीं(उद्देश्य पूरा होगा ही नहीं)।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

भगवान महावीर से उनके सबसे बड़े शिष्य गौतम जी ने पूछा… आप भी इस संसार में, मैं भी; पर आप अबद्ध (संसार/ कर्मों से), मैं बद्ध।
ऐसा कैसे ?
एक आम के पेड़ पर दो तोते। एक आम चख रहा है(बद्ध), दूसरा पेड़ पर रहते भी तटस्थ बैठा है (अबद्ध)।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

इंद्रियों पर नियंत्रण रखने के लिये मन को असंतुष्ट रखें। मीठा मन को अच्छा लगता, सो और-और मांगता है, जिव्हा नहीं।
(असंतुष्ट मन बुझ आता है फिर ज़िद नहीं करता है)।

आचार्य श्री समयसागर जी

अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिये धनोपार्जन आदि क्षेत्रों में निवेश करते रहते हैं।
शुद्ध विचारों का निवेश नहीं करेंगे तो शुद्ध का उत्पादन कैसे होगा ?

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

सामूहिक पूजा करते समय, प्रायः लोग सामग्री पटकते हैं। सलीके से चढ़ायें, तो टेबल/ थाली सुंदर दिखे।
सामने वाला बायें पर डाले तो आप दायें चढ़ाएँ, वो बिगाड़े आप सुधारें। एक सुंदर कृति उभरती जायेगी, देखने में आनंद देगी।

चिंतन

  • दूसरा (जैसा) बनने के लिये की खुद/ निजता की हत्या करनी पड़ती है। फिर भी दूसरे तो बन नहीं पाते।
  • दूसरे को आदर/ प्रमुखता देने से खुद में हीनता।
  • आप Photocopy बन भी गये तो कीमत 2 रुपये।
  • चोरी (व्यक्तित्व) की, सफलता 10% को।
  • विभाव में चाहते हुए भी टिक नहीं सकते, स्वभाव में वापस आने से रोक नहीं सकते।*

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

* Leopard can not change its spots.

धार्मिक क्रियाएँ तो बहुत‌ लोग बहुत सारी करते हैं पर धर्मात्मा वही जो सुख (पुण्योदय) में दुःखी हो (कि भोगना पड़ रहा है) तथा दुःख (पापोदय) में सुखी हो (कि पाप कर्म कम हो रहे हैं)।

दीपा जैन – अमेरिका

कुछ बड़ा चाहिए तो जो है उसकी महिमा बढ़ाओ (बखान करो)/ उसके विज्ञापन बनो।
जिस धर्म/ व्रतादि से तुम्हारी इज़्ज़त बढ़ी है, तुम उस धर्म/व्रतादि की इज़्ज़त बढ़ाओ।
(तुम्हारी इज़्ज़त और बढ़ेगी)।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

सब मनुष्यों के जन्म, मरण तथा दुःख समान ही होते हैं।
दुःख समान कैसे ?
क्योंकि सबके दुःखों के कारण “भ्रम” ही होते हैं। जैसे सोते में समुद्र में डूबने से उभरने का उपाय…
जागना/ तत्व ज्ञान।

क्षु. सहजानंद जी (सुख यहाँ)

मौसमी के 6-7 फ़ीट के पेड़ पर हज़ारों फूल लगे। बाद में सैकड़ों छोटी-छोटी मौसमी की गाँठें सी बन गयीं।
चिंता हुई कि ये छोटा सा पेड़ इतनी मौसमियों का बोझ झेल कैसे पायेगा!
3 सप्ताह बाद कुण्डलपुर यात्रा से लौटा, तो देखा, सिर्फ़ 15-20 मौसमी बढ़ रही हैं।
गुरुवर श्री क्षमासागर जी कहते थे, “तुम्हारे कर्म तो बौर जैसे हैं; बहुत हैं। यदि सब एक साथ फलित हो जायें, तो तुम्हारा पाउडर भी नहीं बचेगा!”
पुण्य-क्रियाओं से पाप-प्रकृतियाँ झड़ जाती हैं या/और कम हो जाती हैं।

चिंतन

जीवनोद्देश्य… जिनादेश* पालन।
अनुपदेश…..अन्य का उपदेश नहीं।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

* भगवान का आदेश।

मूल पर नज़र न रखना ही बड़ी भूल है।
मूल पर नज़र तभी जाती है जब नज़र शुद्ध हो।
नज़र शुद्ध कैसे हो ?
नज़र = ना + ज़र (धन)। धन का संग्रह करना बुरा नहीं, परिग्रह (उससे ममत्व रखना) बुरा है।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

Boss के Boss तक मेरे मित्र ने मेरे ख़िलाफ़ शिकायत की। मैं Boss के पास जाकर दु:खी हुआ।
Boss… ये तो तुम्हारे हित में हुआ है। जितनी जल्दी व्यक्ति का स्वभाव पता लगे उतना अच्छा।
सुनते ही मन शांत।
कहीं अपना स्वभाव पता लग जाए तो कितनी शांति मिलेगी !

चिंतन

(हाँ! दो टके की हांडी तो गई पर कुत्ते की जात पहचानी गई… जे.पी.शर्मा-जयपुर)।

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