प्राय: आचरण का अभिप्राय अच्छे काम करने से लिया जाता है, पर करने से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है, क्या नहीं करना चाहिए ।
मुनि श्री सुधासागर जी
वैभव पुण्य से मिलता है, जीवन पुरुषार्थ से बनता है ।
स्वर्ग जाना नहीं, जीवन को स्वर्ग बनाना है ।
चरण नहीं, चरण-चिन्ह पूजे जाते हैं,
क्योंकि वे ही मोक्ष-मार्ग को चिन्हित करते हैं ।
शुभ विचार आयें तो संकल्प ले लो,
अशुभ आयें तो आलम्बन बदल लो ।
अपने गुनाहों पर सौ पर्दे ड़ाल कर, हर शख्स कहता है – “ज़माना ख़राब है”
(जे.पी.शर्मा)
किनका पुण्य ज्यादा, भारतीयों का या अमेरिकन का ?
पुण्य भोग अमेरिकन ज्यादा रहे हैं, कमा भारतीय ज्यादा रहे हैं ।
इच्छा नहीं, आशा रखें,
इच्छा दु:ख का कारण है,
आशा विषम परिस्थितियों में सकारात्मकता प्रदान करती है ।
ये नर्म मिजा़जी ही है,
कि फूल कुछ नहीं कहते !..
वरना कभी दिखलाइये,
कांटों को मसलकर….!!
(मंजु)
ज्ञानी शरीर और आत्मा के भेद को जानता/मानता है,
उलझाता नहीं/सुलझाता है,बिखरे को समेटता है;
पर विद्वान नहीं ।
दोषों में छेद कर देना ।
बीमारी में कड़वी दवा दंड़ नहीं होती,
ऐसे ही प्रायश्चित , बीमारी अच्छी करने की विधि है ।
धर्म को विचार,
दर्शन को विश्वास,
और
आध्यात्म को आचरण कहते हैं ।
गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी
आग्रह, आशंका, आवेश और आसक्ति में लिये गये निर्णय सही नहीं होते ।
आटे से रोटी बनाना – उपयोग,
खुद और दूसरों को खिलाना – सदुपयोग,
बिगाड़ना – दुरुपयोग
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