“कुछ भी मेरा नहीं” आकिंचन्य और इस भाव का आना आकिंचन्य-धर्म।
भीड़ में रहकर अपने नीड़ में रहना आकिंचन्य।
अनुलोम-विलोम में साँस का ग्रहण और त्याग किया जाता है। पर आकिंचन्य ग्रहण और त्याग के ऊपर।
वियोग और विरोध जन्य अभाव आकिंचन्य नहीं उसमें तो अवसाद होता है, अभाव में विनोद और आनंद आकिंचन्य है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी महाराज

जीवन में संयम धारण करने के बाद त्याग के भाव आना चाहिए/ आते ही हैं।
दान के लिए धन संग्रह समझदारी नहीं। यह तो ऐसा ही हो गया कि शांति के लिए पहले हम अशांत हों।
शरीर आदि को पर पर कहते हुए भी हम उसमें तत्पर क्यों रहते हैं !
एक डब्बे में सात डंडियाँ टाइट करके भरी हुई हैं, उल्टा करने पर भी गिर नहीं रहीं हैं। लेकिन एक डंडी को हम निकाल देते हैं तब बाकी छह अपने आप पर गिर जाती हैं। उस डंडी का नाम है “धन”, इसका त्याग करते ही, शरीर/ घर/ पत्नी/ संतान/ मित्र/ शत्रु सब अलग होने लगते हैं।
विचार तो करें…यह धन हम पाप से कमा रहे हैं, पापियों के लिए, पाप में लगाने के लिए!
अब तो इसका सदुपयोग कर अपनी समझदारी का परिचय दें।

मुनि श्री सौम्य सागर जी महाराज

“इच्छा निरोध: तप:”,
आचार्य विद्यासागर जी कहते थे -> “अपेक्षा निरोध: तप:।”
शरीर की वयस्कता उम्र से, मन की तप से।
तप से रसायन आदि प्राप्त किया जा सकता है जिससे प्रभावना तो होगी, जग की भलाई भी लेकिन आत्मा को रसमयी बनाने के लिए जो प्रताप किया जाता है, उससे जगत का कल्याण।
यदि हर गलती पर बोर्ड में एक कीली लगाएँ, पश्चाताप होने पर निकाल दें फिर भी जो निशान रह जाते हैं उसको लेकर यदि हम परेशान रहते हैं तो वह होगा सच्चा तप।

मुनि श्री सौम्य सागर जी महाराज

कषायों को मंद करने के बाद ही सत्य प्रकट होता है और सत्य हाथ से फिसल न जाए उसके लिए संयम रखना पड़ता है/ संयम की बाड़ लगानी पड़ती है।
संयम बांधता नहीं बल्कि हमारी गलत धारणाओं से हमें निर्बंध करता है।
संयम दो प्रकार का… एक इंद्रिय संयम (पाँचों इंद्रियों को नियंत्रण में रखना), दूसरा प्राणी संयम (प्राणियों की रक्षा, हमारे द्वारा उनका घात ना हो)।
जिसे अपनी जीभ पर नियंत्रण है, उसका जीवन पर नियंत्रण रहता है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी

चार कषायें जब समाप्त या मंद पड़ जाती हैं तब जीवन में सत्य प्रकट होता है।
जो दिखता है वह सत्य नहीं, ना दिखने वाला ही सत्य है। दिखता है उसका फोटो लिया जाता है, जो नहीं दिखता उसका एक्स-रे।
नियति ने दो आँखें इसीलिए दीं ताकि हम गहराई/ अनेकांत दृष्टि से सच्चाई को समझ सकें, एक जिव्हा इसलिए ताकि हम सिर्फ़ सत्य कहें।
कल्पना सत्य नहीं, साक्षात दर्शन सत्य।

मुनि श्री सौम्य सागर जी

लोभ का उल्टा शौच यानी पवित्रता।
जितनी अपेक्षाएँ ज्यादा होंगी, उतना लोभ ज्यादा होगा।
जिसके मन में लोभ आ जाए उसके आसपास का वातावरण खुशहाल होते हुए भी बेहाल हो जाता है जैसे चंद्रमा की चाँदनी रात, बादल के साथ, अमावस्या बन जाती है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी

मायाचारी का उल्टा/ मन वचन काय की एकरूपता आर्जव धर्म है।
एक मासोपवासी(बहुत अंतराल के बाद आहार लेने वाले) मुनिराज तपस्या करके चले गए। उसी स्थान पर एक दूसरे मुनिराज तपस्या करने लगे। लोगों ने समझा वही मासोपवासी मुनिराज हैं और वे जय जयकार करने लगे। दूसरे मुनिराज इस भ्रम को समझ तो गए पर उनके मन में यह भाव आ गया कि मैं थोड़े ही मायाचारी कर रहा हूँ, इन लोगों ने गलत समझा तो मैं क्या करूँ। इस ज़रा से मायाचारी के भाव से उनका दिगंबरत्व दिगंबर(नग्नता) हो गया और अगले जन्म में वह हाथी बने। माया करने से पशु की काया मिली।
सावधान! यदि हम मायाचारी करेंगे तो अगले जन्म में जानवर बनेंगे। जब कर्मों ने बड़े-बड़े मुनिराजों को नहीं छोड़ा, वे हमको क्या छोड़ेंगे!

मुनि श्री सौम्य सागर जी

(धर्म और गुरु की ना मानना, मान है।)
मान का विपरीत,
अपने मान को मान ना देना,
दूसरे के मान से आहत न होना मार्दव धर्म है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी

दसलक्षण धर्म के प्रथम दिवस उत्तम-क्षमा की बधाई,
सबसे क्षमा भाव।
दृष्टि-संयम का पालन करें। लाभ…जीवों की रक्षा, ठोकर न लगना, विकारों का ना आना, आँख की धूल से रक्षा।
अब शेर की दहाड़ हिंसा करने के लिए नहीं, हिंसा करते हुए जीवों को दहलाने के लिए।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (तत्वार्थ सूत्र – 7/14)

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पार्टी आदि में अनर्गल प्रवृत्ति करते समय सुख लगता है, तो ग़लत क्या ?
आपकी प्रवृत्ति से दूसरों को दु:ख/ अशांति, यह ग़लत हुआ/ हिंसा हुई।
ख़ुद की आत्मा का घात होने से अंतरंग हिंसा भी।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्वार्थ सूत्र – 7/14)

10 आमों में एक और मिलाया तो कुल कितने हुए ?
12
कैसे ?
10 + 1 + 1 मेरे पास पहले से था।
हम अपनी-अपनी अपेक्षाओं से निर्णय लेते हैं/ गणित बिठाते हैं, इसलिए हमारा हिसाब गलत हो जाता है।

ब्र. (डॉ.) नीलेश भैया

महावीर मुनि अवस्था में एक गाँव में लंबे समय तक ध्यान तप करते रहे। गाँव वालों ने घास की झोपड़ी बना दी। गाँव वालों ने देखा कि झोपड़ी को जानवर खा गए। महावीर अभी भी ध्यान में है।
गाँव वाले… आपने बचाया क्यों नहीं ?
महावीर… शरीर ही मेरा नहीं, उसकी सुरक्षा का भाव नहीं, तो अन्य की सुरक्षा का भाव कैसे होगा !

ब्र.(डॉ.) निलेश भैया

सब अपनी-अपनी अपेक्षा से पूर्ण हैं जैसे पानी से भरी छोटी तथा बड़ी बाल्टियाँ।
छोटी बाल्टी में पानी और डालो तो पानी Waste ही होगा, पूर्णता बढ़ेगी नहीं, आपका पुरुषार्थ भी निरर्थक होगा।

चिंतन

एक राजा को घोड़ा बहुत प्यारा था। पर उसकी बुरी आदत से राजा को नीचा देखना पड़ता था। चलते-चलते घोड़े को खाने की चीज दिख जाए तो बस उधर ही चल देता था।
पुराने सईस को बुलाया गया, उसने घोड़े को दौड़ाया जैसे ही वह खाने की ओर बढ़ता सईस कोड़ा मारता, दो-चार कोड़े खाकर उसने यह आदत छोड़ दी।

हमारा मन भी घोड़े की तरह है, संसार की ओर भागे तो तगड़े प्रायश्चित का कोड़ा लगा दें, धीरे-धीरे भागना छोड़ देगा।

ब्र. (डॉ.) निलेश भैया

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