“वस्तु का स्वभाव ही धर्म है।”
तुम धर्मात्मा बनना चाहते हो ?
यदि हाँ, तो अपने स्वभाव में रहो।

चिंतन

2 मुर्गे लड़ते हैं प्रतिक्रिया के कारण।
यदि प्रतिक्रिया न करें तो सामने वाले की स्थिति उस मुर्गे जैसी हो जाएगी जो दर्पण में चोंच मार-मार कर घायल हो जाएगा,
दूसरा मुर्गा यानी आप दर्पण के पीछे सुरक्षित।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

गुरुजन कहते हैं → धर्म ध्यान हर समय करते रहना चाहिए। पर हर समय पूजादि तो सम्भव नहीं !
पूजादि तो धर्म के बाह्य रूप हैं, असली तो अंतरंग है और वह सम्भव होता समता-भाव से।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

भगवान से कभी यह वर मत माँगना कि मैं अपने बच्चों की हर इच्छा पूरी कर सकूँ।
ऐसा वर माँगा, तो धृतराष्ट्र बन जाओगे।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

तारीफ़ नहीं,
अपनी ओर देख,
चक्कर नहीं।

(जैसे झूले पर चक्कर तभी आते हैं जब बाहर की ओर देखते हैं)।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

गाड़ी जब रिवर्स में जाती है तब गति तो कम पर सावधानी ज्यादा रखनी पड़ती है।
ऐसे ही बाहर से अंदर की यात्रा करते समय गति तो कम पर सावधानी बहुत रखनी चाहिए।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

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