Month: May 2026

द्रव्य / तत्त्व

सभी जीव द्रव्यों का तत्त्व तो एक ही है। पर चिंतन सबका नहीं, एक अपने जीव-तत्त्व का करना है। सो द्रव्य सब, तत्त्व एक। आर्यिका

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भक्ति

आचार्य श्री विद्यासागर जी (…,ऐसी प्रकृतियों का बंध होता है जो सारे बंधनों को काटने में समर्थ होती हैं।)

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विपाक

विपाक = फलानुभूति। भेद –> जीव विपाक = फलानुभूति जीव को जैसे ज्ञानावरणादि। पुद्गल विपाक = फलानुभूति पुद्गल के माध्यम से जैसे नामकर्म। क्षेत्र विपाक

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स्व-पर कल्याण

दया, पूजा आदि करके हम दूसरे का कल्याण नहीं करते; उसे लाभ नहीं देते। हम तो अपना कल्याण करते हैं। हमारे दान से ग़रीब को

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पूजादि

पूजादि 6 आवश्यक, मोक्षमार्ग की पर्याय हैं। चिंतन

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समता

जब किसी के प्रति राग जागृत हो तब उसके दोषों का चिंतन करें, द्वेष के समय गुणों का । गुण/ अवगुण तो सब में होते

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अनुभाग-बंध

“विपाकोनुभव:” तत्त्वार्थ सूत्र – अध्याय 8/21 अनुभाग तथा अनुभव एकार्थक; तथा भिन्नार्थक भी… अनुभाग…कर्मबंध के समय की शक्ति। अनुभव…कर्मफल के समय की शक्ति मुनि श्री

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सब सर्वोत्तम

जो सब कुछ सर्वोत्तम चाहते हैं। वे अगले भव में द्रौपदी (पौराणिक परम्परानुसार) बनते हैं। द्रोपदी ने 5 क्षेत्रों के सर्वोत्तम पति का वरदान मांगा

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उपयोग

श्रावक श्रमण की तुलना में अधिक सत्य बोलते हैं। कैसे ? श्रावक से पूछो, “बुखार है?” श्रावक- “है।” किन्तु श्रमण कहेगा, “नहीं।” “पर शरीर तो

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कर्म

कर्म कटते हैं, जगने से। बंधते हैं, सोने से। मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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मंगल आशीष

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May 26, 2026