Month: May 2026
मैनासुन्दरी
इनके तो नाम में ही इनकी महानता छिपी है… “मैं ना सुन्दरी” !! मुनि श्री मंगलानन्द सागर जी
प्रतिक्रिया
पागल को जवाब देने वाला “डबल पागल”। आधे पागल (क्रोधादि में) को जवाब देने वाला फुल पागल ही तो कहलायेगा ना ! चिंतन
श्री कृष्ण जी
श्री कृष्ण जी की तीर्थंकर प्रकृति बंध गयी है, यह अभी निर्णीत नहीं है। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
गुरु
सोलर पैनल जैसे होते हैं गुरु। अपनी Energy ख़ुद पैदा करते रहते हैं। फ़र्क यह है कि इनकी Energy रात/ सोते में भी चार्ज होती
निकाचित
निधत्ति निकाचित कर्म देवदर्शन से समाप्त। दूसरे मतानुसार आठवें गुणस्थान में। दोनों मतों में सामंजस ? चौथे से आठवें गुणस्थान में… प्रथमानुयोग/ चरणानुयोग से चौथे
पुरुषार्थहीन
जिनको लगता है कि उनके फैसले रब करेगा, वे बैठे हैं कि अब करेगा-अब करेगा। (ब्र. डॉ. नीलेश भैया)
अंतरात्मा
आचार्य वीरसेन स्वामी जी की मनोरंजक/ विनोदपूर्ण युक्ति –> सिद्ध भगवान को बहिरात्मा कह सकते हैं क्योंकि वे कर्म रूपी गर्भ के बाहर हैं। संसारी,
पुण्य
आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे, “पाप मल है, पुण्य जल है। मल धोने के लिए जल आवश्यक है।” आचार्य श्री समयसागर जी
रागद्वेष
रागद्वेष में वासना आ जाती है, जो संसार बढ़ाने में निमित्त है। लेकिन रागद्वेष की एक समय की पर्याय वासना का रूप नहीं लेती। क्षु.
दीन / शुद्ध
अपने को दीन मानना जैसे हीरे को काँच मानना। शुद्ध मानना जैसे खदान में पड़े हीरे को तराशा हुआ हीरा मानना। चिंतन
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