Category: वचनामृत – अन्य

नसीहत / वसीयत

नसीहत प्राय: अच्छी नहीं लगती क्योंकि उसमें कुछ छोड़ना होता है, जबकि वसीयत में मिलता है । जिन्होनें नसीहत सही से ली हो उन्हें वसीयत

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भगवान की शरण

शनि, मनी और दुश्मनी उन्हीं को प्रभावित करते हैं… जो चिंतामणी की शरण में नहीं रहते । मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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आत्म-कल्याण

घर में रहकर आत्म-कल्याण कैसे करें ? घर को “मेरा” ना मान कर, “बसेरा” मानना शुरू कर दो । मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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तप / त्याग

त्याग बाह्य वस्तु का, तप अंतरंग इच्छाओं का (इच्छा निरोध: तप:) मुनि श्री सुधासागर जी अपेक्षा निरोधः तपः आचार्य श्री विद्या सागर जी

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पाप पुण्य

इस युग में पाप ज्यादा या पुण्य ? ज्यादा कैसे ?? उत्तर… अंधे ज्यादा या दोनों आँखों से देखने वाले ? अपाहिज कितने ? स्वस्थ

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सन्यास

सत्य में व्यस्त होकर, संसार से विरक्त होना ही सन्यास है । मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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चिंता / चिंतन

चिंता एक विषय पर अटक जाना, चिंतन एक विषय से आगे बढ़ जाना । चिंता से बचने का चिंतन सही/आसान तरीका है । मुनि श्री

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पाना

सिर्फ़ चाहने से पाया नहीं जाता, पाने की चाह छोड़ने से पाया जाता है/उस राह पर चलने से पाया जाता है । मुनि श्री प्रमाणसागर

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दूरियाँ

पुस्तक को आँखों के बहुत करीब रखने से पढ़ नहीं पाओगे तथा आँखों में भी दर्द होने लगेगा । सांसारिक संबंधों में भी उचित दूरी

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मंगल आशीष

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