अमेरिका के बड़े धनी एंड्रयू कार्नेगी ने सफलता का रहस्य वबताया…
सोने की खदानों में टनों मिट्टी हटाने/Ignore करने पर एक/दो ग्राम सोना नज़र आता है।
इससे आदत पड़ जाती है, अवगुणों को ignore करके गुणों को ग्रहण करने की।
ब्र. (डॉ.) निलेश भैया
जैसे-जैसे पैसा बढ़ता जाता है, शून्यता भी बढ़ती जाती है(1, 10, 100…..)।
इसीलिए बुजुर्गों ने 11-101 आदि की भेंट शुरू करी ताकि एकता(1) बढ़े।
गौरव – चिंतन
इसलिए ही कहा जाता है… मुर्गी जैसे जैसे मोटी होती जाती है, उसके अंडे वैसे वैसे छोटे होते जाते हैं! यानी जमा में शून्य बढ़ते जाते हैं।………….. जे.पी.शर्मा

“छाता” बारिश तो नहीं रोक सकता,
पर “बारिश” में खड़े होने का “साहस” ज़रूर देता है।
ठीक उसी तरह “आत्मविश्वास,”सफलता” की गारंटी तो नहीं देता,
लेकिन “संघर्ष” करने की “प्रेरणा” अवश्य देता है।
(राजीव जैन – नया बाजार मंदिर-ग्वालियर)
सबसे करीब हमारी आत्मा, लेकिन करीब रहते हैं दूसरों की आत्मा के।
“स्व” के ऊपर श्रद्धालु ही “पर” श्रद्धालु हो सकता है।
जो ख़ुद सुखी नहीं वह दूसरों को सुखी कैसे रख सकता है!!
ब्र. (डॉ.) नीलेश भैया
दीवारों ने छत से कहा…तुम हम पर ही टिकी हो।
छत ने कहा… तुम्हारी सुरक्षा मुझसे ही है।
फर्श चुप ना रह सका बोला… मेरे बिना तुम खड़े किस पर होते! पर हम तीनों के मिलने से ही घर का और हम सब का अस्तित्व है।
अमिताभ बच्चन
दीपक (माँ रूप) पूरे घर को प्रकाशित करता है, पर दिया तले अंधेरा (माँ अपना ध्यान नहीं रखतीं)।
उस अंधकार को दूसरे दीपक दूर कर सकते हैं, ख़ुद प्रकाशित (श्रद्धा/ सेवा) होकर।
ब्र. (डॉ.) नीलेश भैया
दान अपने से बड़ों को….
- जिससे उनकी पूज्यता बढ़े।
- ख़ुद पूज्य बनने को।
पुण्यहीनों को सहयोग।
व्यवहार में तो दान शब्द बहुत जगहों पर प्रयोग कर लेते हैं जैसे पानदान आदि में।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
परिवार….
परि = चारों ओर से।
वार = 1. आघात/ चोट पहुँचाना।
2. अवसर/ चोटी पर पहुँचाना।
हम कैसा परिवार विकसित कर रहे हैं !
ब्र. (डॉ.) निलेश भैया
संसार मार्ग… जियो और जीने दो।
मोक्ष मार्ग… न मरो (मोक्ष यानी अमरता), न मरने दो (मोक्षमार्गी को देखकर अन्य भी मोक्ष-पुरुषार्थ करके अमरता की ओर बढ़ेंगे)।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

(मंजू रानीवाला)
घना कोहरा पूरे दिन छाया रहा। सूरज भी पूरे दिन ताप देता रहा, फिर भी कोहरा कम न हुआ।
हमारी पुण्य क्रियाएँ भी ऐसी ही हैं। यदि पाप का कोहरा घना हो तो सूर्य के ताप की तरह लगेगा कि यह क्रियाएँ पाप को काट नहीं पा रही हैं,
पर ध्यान रहे…आज कोहरा नहीं हट पा रहा, लेकिन कल को कम घना, या नहीं रहेगा।
चिंतन
शुरू में व्यवहार अंत में निश्चय।
एक बच्चा पिता के साथ मेला गया। बच्चा खिलौने के लिए जिद कर रहा था। थोड़ी देर में पिता अलग हो गए। बच्चा रोने लगा। बहुत सारे खिलौने देने पर भी बच्चा लेने को तैयार नहीं।
हमको भी मूल को प्राथमिकता देनी चाहिए।
ब्र. (डॉ.) निलेश भैया
समुद्र नहीं तालाब बनो जहाँ शेर भी सिर झुका कर पानी पीने को मजबूर हो जाते हैं।
हम ऐसे तालाब कैसे बनें ?
जीवन में मधुरता/ उदारता लाने पर।
लाभ क्या होगा ?
तब कर्म भी सिर झुका जाएँगे।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
शिष्य… गुरुजी ! मकान की बहुत परेशानी है। कुछ तरकीब बताएँ।
गुरु… एक घड़ा टेढ़ा करके पेड़ पर लटका दें।
अगली साल तक एक मकान बन गया।
गुरु… यह न टोटका था, ना ही आशीर्वाद। तूने घड़ा लटकाया, उसमें चिड़िया ने घर बनाया, उसकी दुआ से तेरा घर बना।
एन.सी.जैन – नोएडा
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